आज सुबह रसोई में आलू की गंध ने मुझे जगा दिया। माँ पराठे बना रही थीं, और तवे पर सिकते घी की वह खुशबू – कितना अजीब है न कि कुछ गंधें सीधे बचपन में ले जाती हैं।
मैंने आज आलू पराठा बनाने का अपना तरीका थोड़ा बदलने की सोची। हमेशा मसाला भरकर ही पराठा बनाती हूँ, लेकिन इस बार मैंने आटे में ही उबला आलू मिला दिया। पराठा ज्यादा मुलायम बना, मगर उसमें वह परतों वाली खस्ता बनावट नहीं थी। शायद पुराना तरीका ही ठीक था – कुछ चीजें सादगी में ही खूबसूरत होती हैं।
आलू उबलते वक्त मुझे दादी याद आईं। वे कहती थीं, "आलू को ज्यादा नहीं उबालना, वरना स्वाद पानी में बह जाता है।" आज जब मैंने कांटा चुभाया तो आलू बिल्कुल सही था – मुलायम मगर पानी भरा नहीं। दादी की यह छोटी सी सीख हर बार काम आती है।
परांठा तवे से उठाते समय उसकी सतह पर सुनहरे भूरे धब्बे दिखे – घी के निशान। पहला कौर लेते ही जीरे की तीखी खुशबू और हल्की हरी मिर्च की चुभन ने मुँह में जैसे दिवाली मना दी। बाहर से कुरकुरा, अंदर से मुलायम, और साथ में दही का ठंडा, खट्टा स्वाद – यह संतुलन ही तो भारतीय खाने की जान है।
खाने के बाद भी घी की वह गरमाहट हलक में बाकी रही। यही तो असली तृप्ति है – पेट भरा, मन खुश, और यादों का एक नया धागा जुड़ गया।
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