आज सुबह बाज़ार से ताज़ी मेथी लाई थी। पत्तियाँ इतनी हरी और कोमल थीं कि छूते ही उनकी महक उँगलियों में बस गई। धोते समय पानी में वो हल्की कड़वाहट घुल गई, वैसी ही जो मुझे बचपन की याद दिलाती है—जब नानी कहती थीं, "मेथी की कड़वाहट सेहत की मिठास है।"
मैंने आज थोड़ा प्रयोग किया। आधी मेथी को मैंने सिर्फ़ जीरे और हल्दी के साथ भूना, बाकी आधी में अदरक-लहसुन का पेस्ट भी डाला। पहले वाली में वो सादगी थी जो गाँव के चूल्हे की याद दिलाती है। दूसरी में शहर का तड़का—तेज़, चटपटा, लेकिन शायद थोड़ा ज़्यादा।
जब कड़ाही में तेल गरम हुआ और जीरा तड़का, तो रसोई में वो खुशबू फैल गई जो किसी त्योहार जैसी लगती है। मेथी की पत्तियाँ सिकुड़ते हुए गहरे हरे रंग की हो गईं। मैंने एक चुटकी गुड़ डाला—नानी की सीख थी कि कड़वाहट को संभालने का यही तरीका है।
पहली रोटी के साथ चखा तो लगा कि सादे वाली ज़्यादा ईमानदार थी। उसमें मेथी अपनी पूरी पहचान के साथ थी। दूसरी स्वादिष्ट थी, लेकिन मेथी थोड़ी छुप गई मसालों के पीछे। छोटी-छोटी ग़लतियाँ ही तो सिखाती हैं कि कम में भी पूरा स्वाद आ सकता है।
खाने के बाद मुँह में वो हल्की कसैली अनुभूति रही, जो मेथी की ख़ासियत है। और साथ में एक संतोष—कि आज फिर से नानी की आवाज़ सुनी, उनकी रसोई की गंध महसूस की। शायद खाना सिर्फ़ पेट भरना नहीं, यादों को ज़िंदा रखना भी है।
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