रात के करीब दस बजे थे जब पहली बार उस रेकॉर्डिंग में दो स्वरों के बीच का वह ठहराव सुनाई दिया — पंडित भीमसेन जोशी, राग भैरवी, शायद साठ के दशक के मध्य का कोई live session, label की जानकारी मुझे नहीं। तबले की थाप बंद हो चुकी थी, तानपुरे की गूँज अभी बाकी थी, और आवाज़ उस बीच की जगह में टिकी रही — दो बीट नहीं, तीन — जैसे गायक को पता हो कि अगले स्वर की जल्दी नहीं है।
मैं अकेला था, headphones लगाए, कमरे की बत्ती बंद। बाहर Hazra की तरफ़ से बारिश का धीमा शोर आ रहा था। इस condition ने शायद कुछ रंगा होगा सुनने को — हो सकता है मैं ग़लत हूँ। लेकिन उस ठहराव का असर घंटे भर बाद भी बना रहा।
भैरवी का शिल्प यहाँ बहुत सीधा है — कोई बड़ी तान नहीं, कोई चमकदार गमक नहीं। आलाप लंबा है और इतना धीमा कि स्वर एक-दूसरे में ऐसे उतरते हैं जैसे सीमा हो ही नहीं। रेकॉर्डिंग में हल्का-सा hiss है — उस ज़माने का microphone, studio शायद छोटा रहा होगा — और यह hiss कभी-कभी गायकी के साथ घुल जाता है, अलग नहीं रहता। यह कमज़ोरी नहीं लगती; एक तरह की मौजूदगी लगती है।
जहाँ यह रेकॉर्डिंग पहुँचती है — वह मध्यम सप्तक में एक छोटी-सी मींड है, कोमल गंधार से कोमल निषाद तक, बिना किसी ज़ोर के — वह क्षण अपनी जगह खुद बना लेता है। यह virtuosity नहीं है। यह कुछ और है जिसके लिए मेरे पास अभी शब्द नहीं।
जहाँ नहीं पहुँचती — विलंबित खयाल का दूसरा हिस्सा मुझे थोड़ा जल्दी में लगा। मुझे ऐसा सुनाई दिया कि गायक को समय की कमी महसूस हो रही थी, या शायद tape खत्म होने वाली थी। एक जगह आवाज़ थोड़ी सी खिंचती है — और वह खिंचाव, उस पहले ठहराव की तुलना में, कम ठहरा हुआ है। यह कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन वह पहला लम्हा इतना precise था कि बाकी सब उससे नापा जाने लगता है।
यह रेकॉर्डिंग किसके लिए है, यह मैं नहीं बताऊँगा — यह काम पाठक का है। लेकिन अगर किसी रात बारिश हो, बत्ती गुल करने का मन हो, और तीन बीट के ठहराव के लिए धैर्य हो, तो यह एक जगह है।
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