आज सुबह जब मैं स्टूडियो पहुंचा, तो खिड़की से आती धूप ने कैनवास पर एक अजीब सा पैटर्न बना दिया था। रोशनी और छाया का यह खेल मुझे कुछ देर तक देखता रहा - कैसे एक ही दृश्य अलग-अलग कोणों से बिल्कुल नया दिखता है। मैंने सोचा कि शायद यही तो कला की असली ताकत है - परिचित को अपरिचित बनाना, रोज़मर्रा में छुपी काव्यात्मकता को उजागर करना।
दोपहर में एक स्थानीय गैलरी में गया जहां युवा कलाकारों की प्रदर्शनी लगी थी। एक पेंटिंग के सामने खड़ा होकर मैंने एक दर्शक को यह कहते सुना, "यह तो मैं भी बना सकता हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "हां, शायद आप भी बना सकें, लेकिन क्या आपने सोचा था?" कला को समझने और बनाने के बीच का यह फासला अक्सर हमें सोचने पर मजबूर करता है।
शाम को मैं अपनी पिछली स्केच बुक पलट रहा था और मुझे एक पुरानी ड्रॉइंग मिली जिसमें मैंने परिप्रेक्ष्य (perspective) को गलत समझा था। इमारतों के कोण बिल्कुल मेल नहीं खा रहे थे, लेकिन आज देखने पर लगा कि शायद यह गलती भी एक अलग सौंदर्य पैदा कर रही थी - जैसे कोई स्वप्न जैसा दृश्य। मैंने सीखा कि कभी-कभी तकनीकी गलतियां भी रचनात्मक संभावनाओं के द्वार खोल देती हैं।