आज सुबह की रोशनी खिड़की से आते हुए दीवार पर एक अजीब सा पैटर्न बना रही थी—तिरछी, टूटी हुई रेखाएं जो पर्दे के झोलों से छनकर आ रही थीं। मैंने कॉफी का कप हाथ में लिया और उस खेल को देखता रहा। यह वैसा ही था जैसे किसी पुराने जापानी प्रिंट में छाया और रोशनी का संतुलन—कुछ कहे बिना कह देना।
दोपहर में मैं एक पुरानी गैलरी गया जहां एक स्थानीय कलाकार की प्रदर्शनी लगी थी। कैनवास पर मोटे ब्रश स्ट्रोक थे, रंग परत दर परत चढ़े हुए। मैंने पहले सोचा कि यह बेतरतीब है, लेकिन जब मैं पीछे हटा, तो एक चेहरा उभरने लगा—धुंधला, अधूरा, लेकिन जीवंत। यह मुझे याद दिला गया कि कला हमेशा पास से नहीं, बल्कि दूरी से भी समझी जाती है। मैंने एक नोट में लिखा: "करीब जाने पर डिटेल दिखती है, दूर जाने पर अर्थ।"
शाम को मैंने अपनी स्केचबुक खोली और एक पुराने ड्राइंग को देखा जिसे मैंने महीनों पहले छोड़ दिया था। मैंने सोचा कि शायद अब मैं इसे बेहतर तरीके से पूरा कर सकूं, लेकिन पेंसिल उठाते ही मुझे एहसास हुआ कि मेरा हाथ अब अलग तरीके से चल रहा है। पुरानी लाइनें अब अजीब लग रही थीं। मैंने उन्हें मिटाने की कोशिश की, फिर रुक गया। यह गलती नहीं थी—यह मेरा पुराना नज़रिया था। मैंने उसे वैसे ही रहने दिया और बगल में एक नया स्केच शुरू किया।
रात में मैंने एक पुरानी किताब से एक लाइन पढ़ी: "हर रंग अपने पड़ोसी से बोलता है।" यह सच है—रंग अकेले नहीं होते, वे एक-दूसरे को बदल देते हैं। आज मैं इसी संवाद को देखता रहा—रोशनी और छाया में, ब्रश स्ट्रोक और खाली जगह में। शायद यही कला का असली काम है: चीज़ों को अलग नहीं, बल्कि उनके रिश्ते को दिखाना।
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