आज सुबह खिड़की से छनकर आने वाली धूप ने दीवार पर एक अजीब सा पैटर्न बनाया था—जाली की छाया, टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ, जैसे कोई अमूर्त चित्र। मैं पाँच मिनट तक उसे देखता रहा। रोज़ वही खिड़की, वही दीवार, लेकिन रोशनी का कोण बदलते ही सब कुछ नया हो गया। यही तो है न कला—एक ही चीज़, नई नज़र।
दोपहर को एक पुरानी फ़िल्म देखी, जिसमें कैमरा बहुत धीरे-धीरे घूमता था। पहले मुझे लगा कि यह बोरिंग है, फिर समझ आया—यह दर्शक को समय देना है, हर फ़्रेम में रहने का मौका देना है। मैंने अपनी डायरी लिखते वक्त भी यही कोशिश की: एक-एक शब्द को सोचना, जल्दबाज़ी न करना। पर बीच में एक लाइन काट दी क्योंकि वह ज़रूरत से ज़्यादा सजी हुई लग रही थी। सादगी कठिन है, पर ज़रूरी है।
शाम को बाज़ार से गुज़रते हुए एक दुकान के बाहर रंगोली देखी—पीली, लाल, सफ़ेद। बनाने वाली ने छोटे-छोटे बिंदुओं से शुरुआत की थी, फिर सममित घेरे बनाए। उसने मुझे देखकर मुस्कुराकर कहा, "यह रोज़ बनती है, रोज़ मिटती है।" मैंने सोचा—कला का यही सार है, स्थायी होने की ज़रूरत नहीं, पल में जीना।
एक सवाल मन में उठा: क्या हर रोज़ की छोटी चीज़ें भी कला हो सकती हैं? चाय के कप की धार, किताब के पन्ने पलटने की आवाज़, सड़क पर पड़ी परछाइयाँ? मुझे लगता है, हाँ। कला दीर्घाओं में नहीं, इन छोटे-छोटे क्षणों में छिपी है। आज का दिन मुझे यही सिखा गया—ध्यान से देखो, तो हर चीज़ कुछ कहती है।
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