आज सुबह जब मैं बाल्कनी में खड़ा था, तो सूरज की किरणें ठीक उसी कोण पर आ रही थीं जैसे किसी पुराने मास्टर की पेंटिंग में। गर्म सुनहरा प्रकाश दीवार पर एक अजीब सी छाया बना रहा था - एक त्रिकोण जो धीरे-धीरे बदल रहा था। मैंने सोचा था कि इसे अपने स्केचबुक में उतार लूं, लेकिन जब तक मैं पेंसिल लाया, वह आकार बदल चुका था। यही तो खूबसूरती है प्रकाश की - वह कभी ठहरता नहीं, हमेशा चलता रहता है।
दोपहर में एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म देखी - सत्यजीत रे की 'पथेर पांचाली'। हर बार जब मैं इसे देखता हूं, कुछ नया मिलता है। आज मुझे उस दृश्य में कुछ अलग दिखा जहां अपू और दुर्गा पहली बार ट्रेन देखते हैं। कैमरे का वह लंबा शॉट, बच्चों की आंखों में चमक, और बांसुरी का वह संगीत - सब कुछ मिलकर एक ऐसी भावना पैदा करता है जो शब्दों में बयान नहीं हो सकती। मैंने नोट किया कि रे ने प्रकृति को सिर्फ पृष्ठभूमि के रूप में नहीं, बल्कि एक पात्र के रूप में इस्तेमाल किया है।
शाम को एक पुराने दोस्त का फोन आया। उसने पूछा, "तुम हर चीज में कला क्यों ढूंढते हो? कभी-कभी चीजें बस साधारण होती हैं।" मैंने कहा, "शायद तुम सही हो, लेकिन मुझे लगता है कि साधारण चीजों में ही सबसे गहरी सुंदरता छिपी होती है। एक चाय के कप से उठती भाप, बारिश की बूंदों का खिड़की पर गिरना - ये सब छोटे-छोटे compositions हैं।" उसने हंसते हुए कहा, "तुम कभी नहीं बदलोगे।"
रात को अपने स्केचबुक में आज की उस छाया को याद से बनाने की कोशिश की। पहली बार में गड़बड़ हो गई - रेखाएं बहुत कठोर थीं, उस नरम प्रकाश को पकड़ नहीं पाईं। फिर मैंने eraser से कुछ हिस्से हल्का किया और soft strokes इस्तेमाल कीं। तब जाकर वह आकार उभरा जो मैं चाहता था। गलतियां कला सिखाती हैं - यह बात मैं बार-बार भूल जाता हूं और बार-बार सीखता हूं।
जो चीज आज मेरे साथ रह गई वह है प्रकाश की वह क्षणभंगुरता। कैसे वह हर पल बदलता है, कैसे हम उसे पकड़ने की कोशिश करते हैं, और कैसे वह फिसल जाता है। शायद यही तो जीवन है - क्षणों को महसूस करना, उन्हें समझने की कोशिश करना, और फिर उन्हें जाने देना।
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