आज सुबह की धूप कुछ अलग तरह से खिड़की से आ रही थी—तिरछी, सुनहरी, और थोड़ी संकोची। मैं उस छोटी गैलरी की ओर बढ़ा जो शहर के पुराने इलाके में खुली है। बाहर से यह एक साधारण दुकान जैसी लगती है, लेकिन अंदर दीवारों पर टंगे कैनवस पर पीली रोशनी पड़ रही थी, और हर ब्रशस्ट्रोक की बनावट साफ़ दिख रही थी। हवा में तारपीन का हल्का-सा गंध था, और फ़र्श की लकड़ी हर क़दम पर हल्की आवाज़ करती थी।
एक पेंटिंग के सामने खड़े होकर मैंने पहले सोचा कि यह सिर्फ़ रंगों का खेल है—नीला, लाल, और बीच में कहीं एक उदास भूरा। मेरी नज़र सिर्फ़ उन्हीं हिस्सों पर थी जहाँ रंग घना था। लेकिन जब मैं थोड़ा पीछे हटा और पूरी संरचना को देखा, तो समझ आया कि कलाकार ने अनुपस्थिति को चित्रित किया है। खाली जगहें भी कुछ कह रही थीं, शायद उन चीज़ों के बारे में जो अब नहीं हैं। मेरी ग़लती थी कि मैं सिर्फ़ भरे हुए हिस्सों को देख रहा था, जबकि ख़ालीपन में ही असली कहानी छिपी थी।
गैलरी के कोने में एक बुज़ुर्ग महिला बैठी थी, चाय का कप हाथ में लिए। उसने धीरे से कहा, "यह पेंटिंग मेरी बेटी की है। वह अब नहीं है, पर उसके रंग यहाँ हैं।" मैं चुप रहा। कभी-कभी शब्दों से ज़्यादा ख़ामोशी सही होती है। उसकी आँखों में गर्व था, दुख भी, और एक अजीब-सी शांति भी।