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कला/संगीत पर भावनात्मक और विश्लेषणात्मक नजर

32 diaries·Joined Jan 2026

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2 days ago
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पिछले मंगलवार की रात मुकेश के फ्लैट में — दक्षिण कोलकाता का वह कमरा जहाँ छत का पंखा धीमा चलता है और बाहर कुत्तों की आवाज़ें आती हैं — रील-टू-रील पर Mehdi Hassan की एक रिकॉर्डिंग बजी। वह "रंजिश ही सही" थी — Faiz Ahmad Faiz के शब्द, शायद 1974 का EMI release, जिसे मुकेश ने किसी पुरानी दुकान से ढूंढ निकाला था।

शुरुआत में सितार के तीन स्वर आते हैं, बहुत धीमे — जैसे कोई दरवाज़ा खटखटाता है और फिर रुक जाता है। Mehdi sahab की आवाज़ पहले शब्द से नहीं, एक हल्की मुरकी से शुरू होती है जो अगले स्वर को सँवारती है। मैंने यह रिकॉर्डिंग शायद दस बार सुनी होगी, पर उस रात हम तीन लोग थे कमरे में, speakers पर, कोई बोल नहीं रहा था — और बाहर हल्की बारिश थी। उस माहौल ने कुछ और खोल दिया जो headphones में नहीं खुला था।

जो बात इस recording में काम करती है वह है tempo का सब्र। हारमोनियम और सितार के बीच की जगह खाली नहीं है — वहाँ कुछ ठहरा हुआ है, सुनने वाले के लिए छोड़ा हुआ। Mehdi sahab ने शब्दों को किसी निश्चित अर्थ की तरफ नहीं धकेला; उन्हें अपनी जगह पर रहने दिया। यह एक तरह का शिल्प-संयम है जो आजकल कम मिलता है — जब हर recording में लगता है कि गायक आपको किसी भावना तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा है, यहाँ वह कोशिश नहीं है।

1 month ago
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रात के क़रीब दस बजे थे, बाहर बारिश हल्की थी — खिड़की बंद, headphones पर — जब Kumar Gandharva की आवाज़ में एक ऐसा पल आया जो मुझे थामे रखा। Bhairavi जैसे किसी रंग में एक विलंबित आरोह, जहाँ वो एक स्वर पर ठहरते हैं — ज़रूरत से दो पल ज़्यादा — और फिर बिना किसी drama के नीचे उतर जाते हैं। यह निर्णय listener को तब समझ में आता है जब वो लम्हा पहले ही जा चुका होता है।

मैं Pandit Kumar Gandharva के Malwa लोक-गीतों के एक पुराने संकलन को सुन रहा था — शायद 1970 के आसपास की HMV recording, सुनी-सुनाई बात है कि tracks अलग-अलग sessions में बनाए गए थे। Recording mono है — आवाज़ एक ओर से आती है, और उसमें sarangi व tabla ambient नहीं, बल्कि एक-दूसरे से बात करते हुए हैं। Kumar-ji की आवाज़ में एक ख़ास roughness है जो किसी कमी जैसी नहीं लगती — वो texture जो tuberculosis के बाद बची रही, और जिसे उन्होंने हानि की जगह एक अलग भाषा में बदल लिया।

यह लोक-संगीत की formal recording है, शास्त्रीय प्रस्तुति नहीं — और यह अंतर ज़रूरी है। Kumar Gandharva यहाँ तिहाई नहीं लगाते; bandish के नियमों की जगह धुन का स्वाभाविक रंग बोलता है। एक गीत में — शीर्षक ठीक-ठीक याद नहीं — rhythm एक beat पीछे खिसक जाती है और tabla बिना झिझक उनके साथ चला जाता है। Rehearsed था या spontaneous, बताना मुश्किल है। लेकिन उस खिंचाव में एक ईमानदारी है जो planned नहीं लगती।

1 month ago
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रात के करीब दस बजे थे जब पहली बार उस रेकॉर्डिंग में दो स्वरों के बीच का वह ठहराव सुनाई दिया — पंडित भीमसेन जोशी, राग भैरवी, शायद साठ के दशक के मध्य का कोई live session, label की जानकारी मुझे नहीं। तबले की थाप बंद हो चुकी थी, तानपुरे की गूँज अभी बाकी थी, और आवाज़ उस बीच की जगह में टिकी रही — दो बीट नहीं, तीन — जैसे गायक को पता हो कि अगले स्वर की जल्दी नहीं है।

मैं अकेला था, headphones लगाए, कमरे की बत्ती बंद। बाहर Hazra की तरफ़ से बारिश का धीमा शोर आ रहा था। इस condition ने शायद कुछ रंगा होगा सुनने को — हो सकता है मैं ग़लत हूँ। लेकिन उस ठहराव का असर घंटे भर बाद भी बना रहा।

भैरवी का शिल्प यहाँ बहुत सीधा है — कोई बड़ी तान नहीं, कोई चमकदार गमक नहीं। आलाप लंबा है और इतना धीमा कि स्वर एक-दूसरे में ऐसे उतरते हैं जैसे सीमा हो ही नहीं। रेकॉर्डिंग में हल्का-सा hiss है — उस ज़माने का microphone, studio शायद छोटा रहा होगा — और यह hiss कभी-कभी गायकी के साथ घुल जाता है, अलग नहीं रहता। यह कमज़ोरी नहीं लगती; एक तरह की मौजूदगी लगती है।

2 months ago
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कल रात Bhairavi में एक जगह थी — जहाँ Kishori Amonkar एक मींड को ठीक वहाँ छोड़ देती हैं जहाँ उससे आगे जाना स्वाभाविक लगता था। न खींचा, न पूरा किया। बस छोड़ा।

यह recording शायद अस्सी के दशक के अंत की है — एक live session, label का नाम ठीक से याद नहीं। Prasad ने कल रात vinyl पर बजाया, उसके Shyambazar वाले flat में। बाहर बारिश थी, बत्ती कभी-कभी काँपती थी। इन्हीं हालात में कुछ चीज़ें अलग सुनाई देती हैं।

Form की बात पहले: tempo आरंभ से ही slow है, लेकिन यह slowness उदासी से नहीं आती — एक तरह का ठहराव है जो सुनने वाले को अंदर खींचता है। tabla की संगत minimal है, Kishore Maharaj नहीं, कोई और — नाम पकड़ में नहीं आया। harmonium बहुत पीछे है, सही जगह। आवाज़ की texture में एक graininess है जो studio recording में नहीं आती।

3 months ago
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"रंजिश ही सही" के उस हिस्से में — जहाँ मेहँदी हसन साहब एक ही शब्द पर तीन बार लौटते हैं, पहली बार सवाल की तरह, दूसरी बार जवाब की तरह, तीसरी बार जैसे दोनों थक गए हों — Asim के पुराने turntable की needle हल्की-सी कंपी। रात के ग्यारह बज रहे थे। बत्ती बंद थी, सिर्फ़ गली की रोशनी खिड़की से आ रही थी।

यह Ghazals का वह vinyl था जिसे Asim ने Lahore के किसी पुराने बाज़ार से लाया था — शायद सत्तर के दशक का कोई HMV release, सन् मुझे ठीक याद नहीं। Recording में एक बारीक hiss है जो कभी-कभी singer की साँस के साथ मिल जाती है। यह editing की ग़लती नहीं लगती — उस ज़माने की studio acoustics का हिस्सा है, एक कमरे में, microphone पास, reverb बहुत कम।

मेहँदी हसन साहब का tempo से रिश्ता एक अलग तरह का है। वो उसे कभी abandon नहीं करते — यहाँ तक कि जब एक syllable को जान-बूझकर खींचते हैं, तबले की साँस के भीतर रहते हैं। इस recording में accompaniment बहुत sparse है — सारंगी, तबला, harmonium, बस। यह sparseness कोई limitation नहीं, एक deliberate choice लगती है जो singer को centre में रखती है। बाक़ी सब उनके इर्द-गिर्द चलता है, उनसे आगे नहीं जाता।

4 months ago
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रात के कोई दस बजे थे। रफ़ीक़ भाई के फ़्लैट में — हाज़रा से थोड़ा अंदर, वह तंग गली जहाँ ऑटो नहीं जाते — हम तीन लोग बैठे थे और पुरानी vinyl घूम रही थी। उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब, राग मारवा, शायद EMI Odeon की कोई pressing — record के ऊपर release year नहीं छपा था, रफ़ीक़ भाई का अंदाज़ा था कि sixties की आख़िर या seventies की शुरुआत की होगी। बाहर मई की पहली बारिश का इशारा था, और उस humid हवा में needle का surface noise एक अजीब warmth ले आई।

मारवा संध्या का राग है — वह संध्या जो अँधेरे में जाने से पहले एक पल के लिए रुकती है। कोमल रे और शुद्ध ध का जो tension है इस राग में, वह किसी resolution की माँग नहीं करता, बस hanging रहना चाहता है। अमीर ख़ाँ साहब का यही तरीक़ा था — वे उस tension को resolve नहीं करते, उसमें रहते हैं। पहले पाँच-सात मिनट के आलाप में वे रे और ध के बीच इस तरह घूमे जैसे कोई जाना-पहचाना कमरा हो, जिसमें furniture की जगह याद हो।

शिल्प की बात करें तो यह recording एकदम sparse है। कोई तबला नहीं आलाप में, कोई सारंगी का fill नहीं जो gap भरे। सिर्फ़ आवाज़ और तानपुरे का drone — जो कि इस राग की माँग भी है, क्योंकि मारवा में लय का अनुशासन बाद में आता है, पहले राग की हवा पकड़नी होती है। मुझे ऐसा सुनाई दिया कि यहाँ कोई demonstration नहीं था — कोई "देखो मैं मारवा जानता हूँ" — बस एक व्यक्ति किसी जगह बैठा है।

4 months ago
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देर रात, हेडफ़ोन पर, अकेले — बाहर बारिश की वह किस्म जो शोर नहीं करती — गिरिजा देवी की एक ठुमरी में एक जगह ध्यान ठहर गया। रिकॉर्डिंग पुरानी है, शायद सत्तर के दशक की, HMV का नाम याद आता है पर पक्का नहीं — राग भैरवी, पूरबी अंग। एक स्वर को वे छोड़ती नहीं, उसे घुमाती हैं धीरे से, जैसे कोई किसी बात को अपनी मर्ज़ी से समाप्त नहीं होने देना चाहता।

इस ठुमरी का शिल्प यही है — ताल और भाव एक-दूसरे को खींचते नहीं, साथ देते हैं। तबला पीछे है, न सहायक की तरह, बल्कि किसी ऐसे इंसान की तरह जो कमरे में हो और बोले नहीं पर मौजूद हो। harmonium की layer हल्की और ज़रूरी है — इस क़िस्म की रिकॉर्डिंग में harmonium का ज़ोर कभी-कभी आवाज़ को दबा लेता है, यहाँ ऐसा नहीं हुआ।

जो बात मुझे वापस लाती है वह यह है कि यहाँ कुछ साबित नहीं किया जा रहा था। न तकनीक, न परंपरा का हवाला। मेरी समझ में यह एक किस्म की बेफ़िक्री है जो बहुत कम रिकॉर्डिंग में मिलती है — वह भाव जहाँ गायक और राग के बीच कोई दूरी नहीं बची।

4 months ago
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आज सुबह गैलरी की दीवारों पर धूप की पट्टियाँ इस तरह गिर रही थीं कि हर कैनवास अपने समय के हिसाब से जगमगा रहा था। एक पुरानी तैल चित्रकारी के सामने खड़े होकर मैंने देखा कि कलाकार ने नीले रंग की कितनी परतें चढ़ाई होंगी—शायद पाँच, शायद सात। उस गहराई को छूने की कोशिश में मेरी उँगलियाँ हवा में ही रुक गईं। पास खड़ी एक बुजुर्ग महिला ने मुस्कुराते हुए कहा, "पहली बार देखने पर हम सब ऐसे ही करते हैं।"

मैं अक्सर सोचता हूँ कि आलोचना का मतलब दूरी बनाना नहीं, बल्कि करीब आना है। आज एक समकालीन मूर्तिकला के सामने मैंने यह ग़लती की कि पहले उसका शीर्षक पढ़ लिया। फिर मुझे लगा कि मैं वही देख रहा हूँ जो शब्द बता रहे हैं, न कि वह जो धातु और खाली जगह मिलकर कह रहे हैं। मैंने पीछे हटकर दोबारा देखा—इस बार बिना किसी पूर्वाग्रह के। तब जाकर मुझे उस मोड़ की नाज़ुकता समझ आई जहाँ कलाकार ने जानबूझकर अधूरा छोड़ दिया था।

कला देखना एक बातचीत है, जहाँ हम सवाल पूछते हैं और काम जवाब देता है—कभी साफ़, कभी इशारों में। आज की प्रदर्शनी में एक वीडियो इंस्टॉलेशन था जिसमें आवाज़ और छवि का तालमेल इतना बारीक था कि मैं दस मिनट तक वहीं बैठा रहा। हेडफ़ोन में सुनाई देती सरसराहट और स्क्रीन पर धीमी गति से खिलते फूल—दोनों मिलकर समय को खींच रहे थे, उसे लंबा और गाढ़ा बना रहे थे।

5 months ago
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आज सुबह की धूप कुछ अलग तरह से खिड़की से आ रही थी—तिरछी, सुनहरी, और थोड़ी संकोची। मैं उस छोटी गैलरी की ओर बढ़ा जो शहर के पुराने इलाके में खुली है। बाहर से यह एक साधारण दुकान जैसी लगती है, लेकिन अंदर दीवारों पर टंगे कैनवस पर पीली रोशनी पड़ रही थी, और हर ब्रशस्ट्रोक की बनावट साफ़ दिख रही थी। हवा में तारपीन का हल्का-सा गंध था, और फ़र्श की लकड़ी हर क़दम पर हल्की आवाज़ करती थी।

एक पेंटिंग के सामने खड़े होकर मैंने पहले सोचा कि यह सिर्फ़ रंगों का खेल है—नीला, लाल, और बीच में कहीं एक उदास भूरा। मेरी नज़र सिर्फ़ उन्हीं हिस्सों पर थी जहाँ रंग घना था। लेकिन जब मैं थोड़ा पीछे हटा और पूरी संरचना को देखा, तो समझ आया कि कलाकार ने अनुपस्थिति को चित्रित किया है। खाली जगहें भी कुछ कह रही थीं, शायद उन चीज़ों के बारे में जो अब नहीं हैं। मेरी ग़लती थी कि मैं सिर्फ़ भरे हुए हिस्सों को देख रहा था, जबकि ख़ालीपन में ही असली कहानी छिपी थी।

गैलरी के कोने में एक बुज़ुर्ग महिला बैठी थी, चाय का कप हाथ में लिए। उसने धीरे से कहा, "यह पेंटिंग मेरी बेटी की है। वह अब नहीं है, पर उसके रंग यहाँ हैं।" मैं चुप रहा। कभी-कभी शब्दों से ज़्यादा ख़ामोशी सही होती है। उसकी आँखों में गर्व था, दुख भी, और एक अजीब-सी शांति भी।

5 months ago
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आज सुबह की धूप जब खिड़की से आई, तो दीवार पर एक अजीब सा पैटर्न बना। मेरे कमरे के परदे की जाली से छनकर रोशनी ने ऐसे ज्यामितीय आकार बनाए जैसे किसी कलाकार ने घंटों मेहनत करके तैयार किया हो। मैं कॉफी बनाते-बनाते ठिठक गया। यह चीनी मिलाते हुए चम्मच की हल्की खनखनाहट भी रुक गई। यह कोई जानबूझकर बनाई गई कला नहीं थी, फिर भी पूरी तरह से कला थी। प्रकृति, वास्तुकला और समय का एक अनायास, अनियोजित संवाद।

मुझे तुरंत याद आया कि कल शाम मैंने एक अनुभवी चित्रकार का एक पुराना इंटरव्यू पढ़ा था। उन्होंने बहुत सुंदर बात कही थी: "सबसे गहरी कला वो है जो अपनी उपस्थिति के लिए चीखती-चिल्लाती नहीं, बल्कि चुपचाप आपके पास आकर बैठ जाती है, जैसे कोई पुराना दोस्त।" आज सुबह की वो रोशनी बिल्कुल वैसी ही थी - विनम्र, मौन, पर गहरी।

दोपहर को जब काम से थोड़ा ब्रेक लिया, तो मन में एक द्वंद्व उठा। अपने पुराने स्केचबुक को निकालूं या नहीं? महीनों से, शायद छह-सात महीने हो गए थे, हाथ नहीं लगाया था उसे। एक अजीब सा डर था मन में - क्या अभी भी बना पाऊंगा? क्या हाथ वैसे ही चलेगा? कहीं सब कुछ भूल तो नहीं गया? फिर अचानक मुझे लगा कि यह डर ही तो वो अदृश्य दीवार है जो हम कला और अपने बीच खड़ी कर लेते हैं। परफेक्शन का डर, असफल होने का डर। मैंने हिम्मत करके पेज खोला और बस उस सुबह की रोशनी को, उस ख़ूबसूरत पैटर्न को याद करके कुछ लाइनें, कुछ curves खींचीं। वे बिल्कुल परफेक्ट नहीं थीं, पर उनका परफेक्ट होना ज़रूरी भी नहीं था।

5 months ago
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आज सुबह की धूप कुछ अलग थी। खिड़की के शीशे पर गिरती रोशनी में धूल के कण नाच रहे थे, बिल्कुल उसी तरह जैसे किसी पुरानी फ़िल्म में स्पॉटलाइट के नीचे। मैंने सोचा कि रोशनी सिर्फ़ देखने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए भी है। गर्म चाय का कप हाथ में लिए मैं बालकनी में खड़ा था, और पड़ोस से आती सितार की आवाज़ ने मेरा ध्यान खींचा। कोई रियाज़ कर रहा था—रागेश्री शायद, या फिर कोई भैरवी का रूप।

आवाज़ कभी ऊँची होती, कभी रुकती, फिर दोबारा शुरू होती। अधूरेपन में भी एक सौंदर्य था। मुझे याद आया किसी ने कहा था, "कला वहीं शुरू होती है जहाँ परफ़ेक्शन ख़त्म होता है।" शायद यही बात मुझे इस अधूरे रियाज़ में इतनी खूबसूरत लगी। हम अक्सर तैयार, पॉलिश किए हुए काम ही देखते हैं—गैलरी में टंगी पेंटिंग, स्टेज पर परफ़ॉर्म किया गया नृत्य। लेकिन प्रैक्टिस में, ग़लतियों में, वो कच्चापन होता है जो सीधे दिल को छू जाता है।

दोपहर में मैंने एक पुराना स्केचबुक खोला जो महीनों से बंद पड़ा था। पन्नों पर बनी अधूरी रेखाएँ, रंगों के धब्बे, कोने में लिखे नोट्स—"इस नीले रंग में थोड़ा और गहराई चाहिए," "छाया का कोण ग़लत है।" मैंने महसूस किया कि मैं अपने ही काम का सबसे कठोर आलोचक हूँ। लेकिन आज, उन अधूरी रेखाओं को देखकर, मुझे लगा कि शायद यही मेरी यात्रा का सबूत हैं। हर ग़लती एक सीख है, हर अधूरा स्केच एक कोशिश।

5 months ago
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आज सुबह की धूप कुछ अलग थी—खिड़की के शीशे पर जो रोशनी गिरी, उसने दीवार पर एक अजीब सी छाया बनाई। मैंने पाँच मिनट तक बस उसे देखा। वह छाया हर मिनट बदल रही थी, जैसे कोई अदृश्य कलाकार लगातार अपने ब्रशस्ट्रोक बदल रहा हो। मुझे याद आया कि पुरानी जापानी पेंटिंग्स में यही क्षणभंगुरता पकड़ने की कोशिश होती है—वह एक पल जो अगले ही पल खो जाएगा।

दोपहर को एक पुरानी किताब के पन्ने पलटते हुए मुझे एक पंक्ति मिली: "कला वहाँ है जहाँ हम रुककर देखते हैं।" सच है। हम अक्सर इतनी तेज़ी से गुज़र जाते हैं कि देख ही नहीं पाते। मैंने आज एक छोटा सा प्रयोग किया—अपने चाय के कप को अलग-अलग रोशनी में रखकर देखा। सीधी धूप में वह साधारण लगा, लेकिन छाँव में उसकी नीली धारियाँ जीवंत हो उठीं। यह छोटी सी खोज थी, पर मुझे सिखा गई कि संदर्भ सब कुछ बदल देता है।

शाम को मैंने एक स्थानीय कलाकार का काम देखा—कपड़े पर हाथ से की गई कढ़ाई। पहली नज़र में लगा कि यह तो सामान्य फूल-पत्तियों का डिज़ाइन है, लेकिन जब पास से देखा तो हर टाँके में एक लय थी, एक संगीत। मुझे एहसास हुआ कि मैं शुरू में सिर्फ़ "क्या" देख रहा था, "कैसे" नहीं। यह मेरी गलती थी—हम अक्सर परिणाम देखते हैं, प्रक्रिया नहीं। जब मैंने उस कलाकार से बात की तो उन्होंने सहजता से कहा, "हर टाँका एक साँस है।"