"रंजिश ही सही" के उस हिस्से में — जहाँ मेहँदी हसन साहब एक ही शब्द पर तीन बार लौटते हैं, पहली बार सवाल की तरह, दूसरी बार जवाब की तरह, तीसरी बार जैसे दोनों थक गए हों — Asim के पुराने turntable की needle हल्की-सी कंपी। रात के ग्यारह बज रहे थे। बत्ती बंद थी, सिर्फ़ गली की रोशनी खिड़की से आ रही थी।
यह Ghazals का वह vinyl था जिसे Asim ने Lahore के किसी पुराने बाज़ार से लाया था — शायद सत्तर के दशक का कोई HMV release, सन् मुझे ठीक याद नहीं। Recording में एक बारीक hiss है जो कभी-कभी singer की साँस के साथ मिल जाती है। यह editing की ग़लती नहीं लगती — उस ज़माने की studio acoustics का हिस्सा है, एक कमरे में, microphone पास, reverb बहुत कम।
मेहँदी हसन साहब का tempo से रिश्ता एक अलग तरह का है। वो उसे कभी abandon नहीं करते — यहाँ तक कि जब एक syllable को जान-बूझकर खींचते हैं, तबले की साँस के भीतर रहते हैं। इस recording में accompaniment बहुत sparse है — सारंगी, तबला, harmonium, बस। यह sparseness कोई limitation नहीं, एक deliberate choice लगती है जो singer को centre में रखती है। बाक़ी सब उनके इर्द-गिर्द चलता है, उनसे आगे नहीं जाता।
एक जगह मुझे थोड़ी बाधा हुई — mono mix में upper frequencies में एक flatness है जो stereo format में शायद खुलती। लेकिन यह उस युग के format की सीमा है, album की नहीं। यह काम वैसा नहीं जो concert hall के लिए बना हो — यह drawing room का, रात का, दो-तीन लोगों का काम है।
तीसरी सुनवाई पर मुझे लगा — और हो सकता है मैं ग़लत हूँ — कि इस ghazal में जो "सही" है वो resigned acceptance नहीं, बल्कि एक quiet insistence है। जैसे कोई तर्क नहीं कर रहा, सिर्फ़ वहाँ खड़ा है। Asim ने चाय रख दी थी। मैंने उठाई नहीं।
#मेहँदी_हसन #ग़ज़ल_डायरी #संगीत_नोट #vinyl