रात के कोई दस बजे थे। रफ़ीक़ भाई के फ़्लैट में — हाज़रा से थोड़ा अंदर, वह तंग गली जहाँ ऑटो नहीं जाते — हम तीन लोग बैठे थे और पुरानी vinyl घूम रही थी। उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब, राग मारवा, शायद EMI Odeon की कोई pressing — record के ऊपर release year नहीं छपा था, रफ़ीक़ भाई का अंदाज़ा था कि sixties की आख़िर या seventies की शुरुआत की होगी। बाहर मई की पहली बारिश का इशारा था, और उस humid हवा में needle का surface noise एक अजीब warmth ले आई।
मारवा संध्या का राग है — वह संध्या जो अँधेरे में जाने से पहले एक पल के लिए रुकती है। कोमल रे और शुद्ध ध का जो tension है इस राग में, वह किसी resolution की माँग नहीं करता, बस hanging रहना चाहता है। अमीर ख़ाँ साहब का यही तरीक़ा था — वे उस tension को resolve नहीं करते, उसमें रहते हैं। पहले पाँच-सात मिनट के आलाप में वे रे और ध के बीच इस तरह घूमे जैसे कोई जाना-पहचाना कमरा हो, जिसमें furniture की जगह याद हो।
शिल्प की बात करें तो यह recording एकदम sparse है। कोई तबला नहीं आलाप में, कोई सारंगी का fill नहीं जो gap भरे। सिर्फ़ आवाज़ और तानपुरे का drone — जो कि इस राग की माँग भी है, क्योंकि मारवा में लय का अनुशासन बाद में आता है, पहले राग की हवा पकड़नी होती है। मुझे ऐसा सुनाई दिया कि यहाँ कोई demonstration नहीं था — कोई "देखो मैं मारवा जानता हूँ" — बस एक व्यक्ति किसी जगह बैठा है।
एक जगह — recording के शायद बाईसवें-तेईसवें मिनट के आसपास — आवाज़ में एक strain आई। हो सकता है studio acoustics की बात हो, हो सकता है microphone placement। वह लम्हा टूटा। लेकिन उसने मुझे यह भी याद दिलाया कि यह एक इंसान है जो गा रहा है, कोई आदर्श नहीं। और उससे पहले और उसके बाद जो था, वह कहीं और ले गया।
मारवा की एक सीमा यह है — या शायद यह मेरी सुनवाई की सीमा है — कि वह intimacy तो देता है, catharsis नहीं। यह भैरव नहीं है जो सुबह खोल दे, यह भीमपलासी नहीं है जो शाम को एक direction दे। मारवा बस वहीं छोड़ देता है जहाँ से शुरू किया था। अमीर ख़ाँ साहब ने इस recording में उस quality को accept किया है — कोई grand conclusion नहीं खींचा। मेरे लिए यह उनकी ईमानदारी थी, हालाँकि मैं ग़लत भी हो सकता हूँ।
रफ़ीक़ भाई ने record उठाई, मैंने पानी माँगा। बारिश हो गई थी।
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