रात के दस बजते-बजते असीम ने सुई रखी और कमरे में Raag Marwa उतर आया। Ustad Amir Khan का वह recording...
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आज सुबह की धूप जब खिड़की से आई, तो दीवार पर एक अजीब सा पैटर्न बना। मेरे कमरे के परदे की जाली से छनकर रोशनी ने ऐसे ज्यामितीय आकार बनाए जैसे किसी कलाकार ने घंटों मेहनत करके तैयार किया हो। मैं कॉफी बनाते-बनाते ठिठक गया। यह चीनी मिलाते हुए चम्मच की हल्की खनखनाहट भी रुक गई। यह कोई जानबूझकर बनाई गई कला नहीं थी, फिर भी पूरी तरह से कला थी। प्रकृति, वास्तुकला और समय का एक अनायास, अनियोजित संवाद।
मुझे तुरंत याद आया कि कल शाम मैंने एक अनुभवी चित्रकार का एक पुराना इंटरव्यू पढ़ा था। उन्होंने बहुत सुंदर बात कही थी: "सबसे गहरी कला वो है जो अपनी उपस्थिति के लिए चीखती-चिल्लाती नहीं, बल्कि चुपचाप आपके पास आकर बैठ जाती है, जैसे कोई पुराना दोस्त।" आज सुबह की वो रोशनी बिल्कुल वैसी ही थी - विनम्र, मौन, पर गहरी।
दोपहर को जब काम से थोड़ा ब्रेक लिया, तो मन में एक द्वंद्व उठा। अपने पुराने स्केचबुक को निकालूं या नहीं? महीनों से, शायद छह-सात महीने हो गए थे, हाथ नहीं लगाया था उसे। एक अजीब सा डर था मन में - क्या अभी भी बना पाऊंगा? क्या हाथ वैसे ही चलेगा? कहीं सब कुछ भूल तो नहीं गया? फिर अचानक मुझे लगा कि यह डर ही तो वो अदृश्य दीवार है जो हम कला और अपने बीच खड़ी कर लेते हैं। परफेक्शन का डर, असफल होने का डर। मैंने हिम्मत करके पेज खोला और बस उस सुबह की रोशनी को, उस ख़ूबसूरत पैटर्न को याद करके कुछ लाइनें, कुछ curves खींचीं। वे बिल्कुल परफेक्ट नहीं थीं, पर उनका परफेक्ट होना ज़रूरी भी नहीं था।
इस पूरी प्रक्रिया में, पेंसिल और कागज़ के बीच के उस संवाद में, मुझे एक महत्वपूर्ण बात का एहसास हुआ। कला सिर्फ़ अंतिम परिणाम नहीं है, वो उतनी ही उस पल में भी बसती है जब आप ठहरते हैं। जब आप किसी चीज़ को इतनी गहराई और ध्यान से देखते हैं कि उसकी बनावट, उसका आंतरिक rhythm, उसका ख़ामोश संगीत आपको सुनाई देने लगता है। रचना की प्रक्रिया उतनी ही क़ीमती है जितना रचा हुआ।
शाम को जब वही रोशनी फिर से खिड़की से आई, तो मैंने देखा कि पैटर्न पूरी तरह बदल चुका था। सूरज का कोण बदल गया था, समय बदल गया था, और इसलिए दीवार पर की छाया भी। पर वो आंतरिक खूबसूरती, वो सौंदर्य अब भी मौजूद था, बस एक नए रूप में। शायद यही कला का, और ज़िंदगी का भी, सबसे बड़ा सबक है - हर पल अनोखा और अनमोल है, और अगर हम तैयार हों, अगर हम खुले हों, तो हर पल हमें कुछ नया सिखा सकता है।
मेरे साथ जो चीज़ आज रह गई, जो अनुभूति मन में बसी रही, वो यह थी कि सृजन के लिए बड़े-बड़े कैनवास या भव्य, महान विषयों की कोई ज़रूरत नहीं होती। कभी-कभी एक साधारण खिड़की, थोड़ी सी रोशनी, और देखने की, महसूस करने की सच्ची इच्छा ही काफ़ी होती है।
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