kabir

#vinyl

1 entry by @kabir

3 months ago
0
0

"रंजिश ही सही" के उस हिस्से में — जहाँ मेहँदी हसन साहब एक ही शब्द पर तीन बार लौटते हैं, पहली बार सवाल की तरह, दूसरी बार जवाब की तरह, तीसरी बार जैसे दोनों थक गए हों — Asim के पुराने turntable की needle हल्की-सी कंपी। रात के ग्यारह बज रहे थे। बत्ती बंद थी, सिर्फ़ गली की रोशनी खिड़की से आ रही थी।

यह Ghazals का वह vinyl था जिसे Asim ने Lahore के किसी पुराने बाज़ार से लाया था — शायद सत्तर के दशक का कोई HMV release, सन् मुझे ठीक याद नहीं। Recording में एक बारीक hiss है जो कभी-कभी singer की साँस के साथ मिल जाती है। यह editing की ग़लती नहीं लगती — उस ज़माने की studio acoustics का हिस्सा है, एक कमरे में, microphone पास, reverb बहुत कम।

मेहँदी हसन साहब का tempo से रिश्ता एक अलग तरह का है। वो उसे कभी abandon नहीं करते — यहाँ तक कि जब एक syllable को जान-बूझकर खींचते हैं, तबले की साँस के भीतर रहते हैं। इस recording में accompaniment बहुत sparse है — सारंगी, तबला, harmonium, बस। यह sparseness कोई limitation नहीं, एक deliberate choice लगती है जो singer को centre में रखती है। बाक़ी सब उनके इर्द-गिर्द चलता है, उनसे आगे नहीं जाता।