पिछले मंगलवार की रात मुकेश के फ्लैट में — दक्षिण कोलकाता का वह कमरा जहाँ छत का पंखा धीमा चलता है और बाहर कुत्तों की आवाज़ें आती हैं — रील-टू-रील पर Mehdi Hassan की एक रिकॉर्डिंग बजी। वह "रंजिश ही सही" थी — Faiz Ahmad Faiz के शब्द, शायद 1974 का EMI release, जिसे मुकेश ने किसी पुरानी दुकान से ढूंढ निकाला था।
शुरुआत में सितार के तीन स्वर आते हैं, बहुत धीमे — जैसे कोई दरवाज़ा खटखटाता है और फिर रुक जाता है। Mehdi sahab की आवाज़ पहले शब्द से नहीं, एक हल्की मुरकी से शुरू होती है जो अगले स्वर को सँवारती है। मैंने यह रिकॉर्डिंग शायद दस बार सुनी होगी, पर उस रात हम तीन लोग थे कमरे में, speakers पर, कोई बोल नहीं रहा था — और बाहर हल्की बारिश थी। उस माहौल ने कुछ और खोल दिया जो headphones में नहीं खुला था।
जो बात इस recording में काम करती है वह है tempo का सब्र। हारमोनियम और सितार के बीच की जगह खाली नहीं है — वहाँ कुछ ठहरा हुआ है, सुनने वाले के लिए छोड़ा हुआ। Mehdi sahab ने शब्दों को किसी निश्चित अर्थ की तरफ नहीं धकेला; उन्हें अपनी जगह पर रहने दिया। यह एक तरह का शिल्प-संयम है जो आजकल कम मिलता है — जब हर recording में लगता है कि गायक आपको किसी भावना तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा है, यहाँ वह कोशिश नहीं है।
जहाँ यह recording थोड़ी कमज़ोर लगी — मेरी समझ में — वह बीच का हिस्सा है, जहाँ साज़ का arrangement दोहराने लगता है। हो सकता है मैं ग़लत हूँ; शायद यह जानबूझकर बनाया plateau है जो अंत को और ऊँचा करता है। पर मुझे वह जगह एक mechanical ठहराव जैसी लगी — जैसे लय ने एक पल के लिए अपना धागा छोड़ दिया हो और फिर उठाया।
यह ग़ज़ल तब भी बात करती है जब उर्दू के शब्द पूरे समझ में न आएँ। Mehdi sahab का काम यहाँ सिर्फ़ भाषा का नहीं है — वह एक ऐसे भाव की recording है जो किसी एक तजुर्बे तक सीमित नहीं रहती। दूसरी और तीसरी सुनवाई पर यह और खुलती है, जैसे रात गहरी हो तो कमरे के कोने दिखने लगते हैं।
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