आज सुबह जब मैंने 1847 की एक बही खोली — जयपुर रियासत के एक परगने का घरेलू हिसाब — तो बीच के कुछ पन्नों पर एक अलग हाथ की लिखावट मिली। मुख्य लेखक की लिखाई गोल और सधी हुई थी; यह दूसरी लिखाई पतली, थोड़ी झुकी, जैसे जल्दी में लिखी गई हो। हाशिये पर लिखा था: "रामदेई की बिटिया के लिए घी — ३ आने।" नाम था, रकम थी, पर रामदेई कौन थी — यह बही नहीं बताती।
मैंने उसी संदर्भ की और बहियाँ देखीं। एक जगह "रामदेई दाई" का उल्लेख है, पर वह एक अलग संदर्भ में है, और तारीख दस साल पहले की है। यह वही रामदेई है या कोई और — यह अज्ञात है। अनुमान यह है कि वह घर में काम करने वाली कोई स्त्री रही होगी, क्योंकि उसका नाम खर्चे के साथ आता है, किसी संपत्ति के साथ नहीं। पर यह सिर्फ अनुमान है।
तीन आने में घी। मुझे याद आया कि उसी दशक के एक और राजस्व रिकॉर्ड में अकाल-वर्ष 1812-13 का ज़िक्र है जब घी की कीमत कई गुना बढ़ गई थी — पर 1847 के आसपास कोई विशेष अकाल का संदर्भ उस परगने के लिए मुझे नहीं मिला। तो तीन आने शायद सामान्य भाव थे। शायद।