आज सुबह एक पुरानी बही खोली — 1847 की जयपुर रियासत के एक राजस्व रिकॉर्ड की। कागज़ भूरा पड़ गया है, किनारे घुने हैं, लेकिन स्याही अभी भी पढ़ी जा सकती है। फ़सल का हिसाब था — गेहूँ, जौ, बाजरा — और उसी हाशिये पर, किसी दूसरे हाथ ने पेंसिल से लिखा था: "रामू की माँ मरी, अनाज नहीं भेजा।" बस इतना। नाम नहीं, गाँव नहीं — केवल यह छोटा-सा तथ्य जो शायद किसी मुंशी ने अपने लिए नोट किया था।
रामू की माँ — यह ज्ञात है कि वह किसी के हिसाब का एक कारण बनी। यह अज्ञात है कि वह कौन थी, कहाँ से थी, और क्यों मरी। मेरा अनुमान है कि यह 1846-47 का अकाल था जिसका उल्लेख कुछ अन्य दस्तावेज़ों में मिलता है — लेकिन यह केवल संभावना है, निश्चितता नहीं।
उसी बही में आगे के पन्नों पर दाम दर्ज थे: घी, एक सेर, छह आने। तेल, एक सेर, तीन आने। यह पढ़कर कुछ पल के लिए मन अटक गया — छह आने में एक सेर घी। यह कोई बड़ी खोज नहीं है, लेकिन उस साल को अचानक असली बना देती है।