आज सुबह चाय पीते समय मैंने खिड़की से बाहर देखा—धूप की किरणें पुरानी इमारत की दीवार पर पड़ रही थीं, जिसकी ईंटों में अभी भी औपनिवेशिक युग के निशान दिखते हैं। मुझे अचानक याद आया कि 1857 की क्रांति के दौरान दिल्ली में कितनी इमारतें नष्ट हो गईं, और जो बची रहीं, उनमें से कई को बाद में अंग्रेज़ों ने फिर से बनवाया। इतिहास सिर्फ़ किताबों में नहीं, हमारे चारों ओर की दीवारों में भी जीवित रहता है।
दोपहर में एक छात्रा ने मुझसे पूछा, "क्या मुगल काल में भी महिलाएं शिक्षित होती थीं?" मैंने उसे गुलबदन बेग़म के बारे में बताया, जिन्होंने 'हुमायूँनामा' लिखी थी। वह बाबर की बेटी और हुमायूँ की सौतेली बहन थीं, और उनकी आत्मकथा हमें उस दौर के दरबारी जीवन की एक अनूठी झलक देती है। लेकिन मैंने यह भी कहा कि हर महिला को यह अवसर नहीं मिलता था—शिक्षा का अधिकार अक्सर वर्ग और परिवार पर निर्भर करता था।
शाम को मैंने एक पुरानी पांडुलिपि के डिजिटल संस्करण को देखा। पन्नों पर फारसी और देवनागरी दोनों लिपियाँ थीं—यह 18वीं सदी की एक धार्मिक पांडुलिपि थी, जिसमें हिंदू और मुस्लिम विद्वानों ने मिलकर टिप्पणियाँ लिखी थीं। मुझे लगा कि हम अक्सर इतिहास को सिर्फ़ संघर्ष और युद्ध के रूप में देखते हैं, लेकिन सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अनगिनत उदाहरण भी हैं, जिन्हें हम भूल जाते हैं।