आज सुबह एक बंडल खोला जो महीनों से अलमारी के कोने में पड़ा था — 1847 की एक बही, जयपुर रियासत की साँभर तहसील से आई हुई। ऊपर का लेबल आधा फट चुका है, पर कागज़ पर जगह-जगह "साँभर" लिखा मिलता है। बही में राजस्व की सूची है — कौन से गाँव से कितना अनाज, कितने रुपये, कितने बकाया। पर आज मेरी नज़र सूची पर नहीं रुकी। एक हाशिये पर, बारीक हाथ से, किसी ने लिखा था: "रामी का हिसाब अलग देखें।"
रामी। बस इतना। न पूरा नाम, न रिश्ता, न पद, न गाँव। यह हाशिये की लिखावट मूल लिपिक की नहीं है — हाथ अलग है, स्याही हल्की और थोड़ी धुंधली है, शायद बाद में किसी और ने जोड़ी। जो ज्ञात है: इस नाम को किसी ने दर्ज करने लायक समझा। जो अज्ञात है: वह "अलग हिसाब" कहाँ है, और क्यों मुख्य बही में नहीं समाया। अनुमान यही है कि शायद कोई विवादित लेन-देन रहा हो, या वह काम जो मुख्य खाते की परिधि से बाहर रखा जाता था — मज़दूरी, कर्ज़, या कुछ और।
उसी बही में एक और विवरण मिला — घी की दर का ज़िक्र, एक छोटे से कोष्ठक में: "चार आने सेर घी।" बिना किसी तुलनीय स्रोत के यह नहीं कह सकती कि 1847 में यह सस्ता था या महँगा। पर संख्या ठोस है। किसी ने यह लिखा, मतलब यह हिसाब में आती थी — किसी घर का, किसी दफ़्तर का, किसी रसोई का।