आज सुबह जब मैं अपनी खिड़की से बाहर देख रही थी, तो सूरज की पहली किरणें पुरानी इमारत की दीवार पर पड़ रही थीं। उस गर्म, सुनहरी रोशनी ने मुझे अचानक जयपुर के हवा महल की याद दिला दी। मैं सोचने लगी कि कैसे महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने 1799 में उस अद्भुत संरचना का निर्माण करवाया था, ताकि राजपरिवार की महिलाएं बाहर की दुनिया को देख सकें, बिना देखे जाए।
इतिहास में महिलाओं की यह अदृश्यता कितनी विचित्र थी। वे पर्दे के पीछे से शासन चलाती थीं, ज्ञान अर्जित करती थीं, लेकिन उनका अस्तित्व हमेशा छुपा रहता था। आज, जब मैं स्वतंत्र रूप से अपने शोध पर काम करती हूं, अपने विचार व्यक्त करती हूं, तो यह विशेषाधिकार मुझे और भी स्पष्ट महसूस होता है।
दोपहर में मैंने एक पुराना पत्र पढ़ा—1920 के दशक का, जिसमें एक शिक्षिका ने लिखा था: "शिक्षा केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता में है।" यह वाक्य मेरे मन में बार-बार गूंजता रहा।