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आज दोपहर को एक पुरानी बही उठाई — 1847 की, जयपुर रियासत के राजस्व विभाग की। कागज़ पीला और कुछ जगहों से कुरकुरा हो गया है, लेकिन लिखावट अभी भी पढ़ी जा सकती है। एक पन्ने के हाशिये पर, मुख्य लेखक के हाथ से अलग, किसी दूसरे ने छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा है — "सुखिया की बेटी, देखना"। बस इतना। न पूरा नाम, न संदर्भ, न यह स्पष्ट कि किसे देखना है और क्यों।
मुख्य इंदराज में उस पृष्ठ पर किसी "सुखिया" का उल्लेख नहीं है। अनुमान यही है कि यह नोट किसी लिपिक ने अपनी याददाश्त के लिए लिखा था — शायद कोई लंबित मामला था, कोई अपील, या फिर किसी ज़मीन का विवाद जो आगे के पृष्ठों में दर्ज होना चाहिए था। लेकिन आगे के पृष्ठों पर वह नाम नहीं मिला। जो ज्ञात है: यह लिखावट मुख्य लिपिक की नहीं थी। जो अज्ञात है: सुखिया की बेटी का नाम, उसका मामला, और उसका अंजाम।
उसी बही में कुछ पन्ने आगे एक हिसाब था — शायद किसी गाँव के पटवारी का। घी के दाम दर्ज थे: चार आने सेर। 1847 में। यह तुलनात्मक संदर्भ के बिना बहुत कुछ नहीं बताता, लेकिन उसी साल के एक अन्य दस्तावेज़ में — जो मेरे पास कल था — फ़सल कमज़ोर बताई गई थी। तो चार आने महँगा था या सस्ता, यह मैं नहीं कह सकती।
आज वापस आते वक़्त चौड़ा रास्ता पर रुककर एक पुरानी दुकान देखी जिस पर नया साइनबोर्ड लगा था। उस मोहल्ले का नाम बदल गया है — तीसरी बार, किसी ने बताया था। पुराने नक्शे में वह जगह कुछ और थी। दस्तावेज़ों में नाम बदलते रहते हैं, जगहें वही रहती हैं।
"सुखिया की बेटी, देखना" — यह वाक्य किसी ने लिखा था ताकि भूले नहीं। फिर भी भूल गए।
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आज सुबह संरक्षण कक्ष में एक बही खोली जो 19वीं सदी की है — शायद 1838 से 1845 के बीच की, हालाँकि तारीख के पृष्ठ पर स्याही धुँधली है, इसलिए निश्चित नहीं कह सकती। ऊपरी कोने पर "परगना मालपुरा, जयपुर रियासत" लिखा है। और उसी पृष्ठ के हाशिये पर, मुख्य लेखक से बिल्कुल अलग हाथ की लिखावट में — थोड़ी तिरछी, कुछ जल्दबाज़ी में लिखी हुई — किसी ने "रामू मुनीम" जोड़ दिया है। यह नाम किसका है? मूल लेखक का, या किसी जाँचने वाले का? यह मैं नहीं जानती। जो स्पष्ट है वह यह कि यह बाद में जोड़ा गया — मूल स्याही और इस नाम की स्याही में रंग का थोड़ा फ़र्क़ है।
बही के तीसरे हिस्से में एक जगह क़ीमतें दर्ज हैं। एक ब्यौरा यह है: "चार सेर घी — बारह आने।" 19वीं सदी के राजस्व रिकॉर्डों में इस तरह की प्रविष्टियाँ कभी-कभी मिलती हैं — छोटे बाज़ारों की रोज़मर्रा की ख़रीद। यह महँगा था या सस्ता, यह तुलना के लिए दूसरे स्रोत चाहिए जो अभी हाथ में नहीं हैं। मेरा अनुमान है — और यह सिर्फ़ अनुमान है — कि अगर इतनी मात्रा में घी दर्ज हो रहा था, तो शायद किसी बड़े घराने या दफ़्तर का हिसाब है। पर यह अनुमान से आगे नहीं जाता।
उसी बही के एक पृष्ठ पर एक महिला का उल्लेख है — "मुनीम रामू की स्त्री।" नाम नहीं। बस यही परिचय। उसने कुछ अनाज उधार लिया था — "दो पसेरी जौ, उधार।" जो ज्ञात है वह यह है कि रिकॉर्ड में दर्ज हुई। जो अज्ञात है वह यह है कि क्यों उधार लेना पड़ा, और क्या कभी चुकाया गया। रिकॉर्ड वहीं ख़त्म हो जाता है — कोई टिप्पणी नहीं, कोई निशान नहीं।
दोपहर को एक और फ़ाइल देखी — जयपुर रियासत के एक अन्य परगने का हिसाब। उसमें एक तारीख़ है जो मेल नहीं खाती: बही के पहले पृष्ठ पर सन् 1842 लिखा है, पर भीतर एक प्रविष्टि पर 1856 की तारीख़ है। यह या तो बाद में जोड़ी गई है, या नकल करने में हुई चूक है। मैंने फ़ाइल में एक नोट लगा दिया है — आगे जाँचने की ज़रूरत है।
शाम को चौड़ा रास्ता से लौटते वक़्त एक किराने वाले को देखा। वह एक मोटी काग़ज़ी बही में पेन से लिख रहा था — आज की तारीख़, आज का हिसाब। शायद सौ-डेढ़ सौ साल बाद कोई उसकी बही भी किसी अभिलेखागार में देखे। या न देखे।
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