आज सुबह की धूप खिड़की से आती हुई एक पुरानी पाण्डुलिपि पर पड़ी थी। धूल के कण उस रोशनी में तैरते दिख रहे थे, और मुझे अचानक याद आया कि मध्यकाल के लिपिकार भी ऐसी ही खिड़कियों के पास बैठकर काम करते थे। उनके लिए प्राकृतिक प्रकाश ही एकमात्र साधन था।
मैं आज नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश के बारे में पढ़ रही थी। बारहवीं सदी में बख्तियार खिलजी ने इस महान शिक्षा केंद्र को जला दिया था। कहते हैं कि पुस्तकालय तीन महीने तक धधकता रहा। लाखों पाण्डुलिपियाँ राख हो गईं। मैं सोचती हूँ - कितना ज्ञान, कितनी बुद्धिमत्ता, कितने प्रश्न और उत्तर उस आग में खो गए।
दोपहर में मैंने अपनी डिजिटल लाइब्रेरी का बैकअप लेने का निर्णय लिया। यह एक छोटा सा काम था, पर मुझे लगा कि यह ज़रूरी है। हम सोचते हैं कि डिजिटल युग में सब कुछ सुरक्षित है, पर क्या वाकई है? एक वायरस, एक सर्वर क्रैश, और सब कुछ गायब हो सकता है। शायद हर युग को अपने ज्ञान की रक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है।