आज शाम माँ ने रोटी के लिए तवा गरम किया। मैं पानी का गिलास लेकर पास खड़ा था, बातें कर रहा था। अचानक उनके हाथ से थोड़ा पानी गिरा — सीधे तवे पर। बूँद फुफुफु करके उड़ नहीं गई; गोल-मटोल होकर तवे पर इधर-उधर फिसलती रही, कई सेकंड तक। मैं चुप हो गया।
सवाल सीधा था: ठंडे तवे पर पानी फैल जाता है, थोड़े गरम पर भाप बन उड़ता है — पर बहुत गरम पर नाचता है। क्यों?
इस घटना को thermodynamics में Leidenfrost effect कहते हैं। जर्मन चिकित्सक Leidenfrost ने 1756 में इसे एक किताब में describe किया था — यह reference सामान्य fluid mechanics की किताबों में मिलता है। जब तवे का तापमान पानी के boiling point (100°C) से काफ़ी ऊपर हो जाता है — मोटे तौर पर 150-200°C के ऊपर — तो बूँद के नीचे की परत तुरंत भाप बन जाती है। यह भाप की पतली परत एक cushion की तरह काम करती है, बूँद को तवे से अलग रखती है।
नतीजा counterintuitive है। जब तवा 120°C के आसपास हो, बूँद तवे को छूती है, जल्दी उड़ती है। पर 200°C से ऊपर, भाप का cushion बूँद को इंसुलेट कर देता है — direct contact नहीं होता। इसीलिए ज़्यादा गरम तवे पर बूँद ज़्यादा देर टिकती है। पहली बार सुनने में उलटा लगता है।
एक rough estimate: cushion की मोटाई 0.1 mm के order में होगी — यह मेरा अनुमान है, किसी textbook से verify नहीं किया। बूँद का weight और नीचे बन रहे vapor का pressure एक balance बनाते हैं, उसी से मोटाई तय होती है। घर्षण इस vapor परत पर बहुत कम होता है, इसलिए बूँद आसानी से फिसलती है।
एक बात जो मुझे अभी पक्की नहीं पता: क्या बूँद के अंदर भी internal circulation होती है जो उसे घुमाती है? लगता है हाँ, पर mechanism मुझे ठीक से नहीं मालूम। यह fluid dynamics का वह कोना है जहाँ मेरी पकड़ कमज़ोर हो जाती है।
रसोई में जो रोज़ दिखता है, उसमें अक्सर एक threshold छुपी होती है — एक temperature जहाँ behaviour अचानक पलट जाता है। आज की बूँद उसी threshold का demonstration थी।
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