रात के ग्यारह बजे वो आखिरी बक्से की टेप बंद कर रही थी, जब बिजली चली गई।
कमरे में अँधेरा था, पर वो उठी नहीं। मोबाइल की रोशनी में दीवार दिखी — उस जगह जहाँ साल भर से एक कैलेंडर लटका था, वहाँ अब बस दो टेप के पीले निशान रह गए थे। जैसे दीवार ने याद रखने की कोशिश की हो।
सुबह ट्रक आएगा। यह उसका आखिरी किराए का घर था इस शहर में — पाँच साल। पहले साल उसने खिड़की के पास एक थर्मस रखा था, हर सुबह उसमें चाय भरती थी। थर्मस कहीं पैक हो गया था, कब — याद नहीं।
बाहर से किसी गली में एक कुत्ते की आवाज़ आई, फिर शांत हो गई।
उसने फोन निकाला। एक पुराना मैसेज था — तीन साल पहले का, उसी कमरे में लिखा हुआ: "यहाँ से मत जाना, यही घर है।" उसने भेजा था। उसे नहीं।
मैसेज अब भी वैसे ही रखा था, किसी ने डिलीट नहीं किया।
बिजली वापस आई। CFL ने एक बार झपकी ली, फिर टिक गई।
उसने थर्मस वाला बक्सा ढूंढने की नहीं सोची। बस दीवार के उन पीले चौकोर निशानों को एक बार देखा — जहाँ तारीखें लटकती थीं — और बक्से पर ही बैठ गई।
सुबह होने में अभी देर थी।
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