रात के ग्यारह बजे थे जब उसने कमरे का आख़िरी बल्ब बंद किया। फिर याद आया कि चाबी लौटानी है मकान मालकिन को, तो वापस जलाया।
कमरा खाली था। दीवारें वैसी ही थीं — बस पहले अपनी लगती थीं, अब नहीं लगतीं। एक पुराना nokia चार्जर सॉकेट में अटका रह गया था, काला पड़ा हुआ। कब से था, याद नहीं। शायद पहले वाले किरायेदार का, या उससे भी पहले वाले का। इस कमरे में उससे पहले कितने लोग रहे होंगे — यह उसने कभी नहीं सोचा था।
उसने दीवार पर हाथ फेरा। टेप के चार निशान थे — जहाँ पहले साल का कैलेंडर लगा था, जहाँ एक फोटो लगाने की सोची थी पर कभी लगाई नहीं, जहाँ बिजली का तार दबाकर रखा था, और एक जो याद नहीं कब और क्यों बना। सब पीले थे, थोड़े उठे हुए, जैसे दीवार को याद हो जो उसे नहीं।
वह खिड़की के पास ज़मीन पर बैठ गई। नीचे मोहल्ले का वही नल था जो रोज़ रात एक बजे बंद हो जाता था — खुद-ब-खुद, या कोई बंद करता था, उसे कभी पता नहीं चला। पहले दिन उसने सोचा था कि अच्छा है, रात को आवाज़ नहीं आएगी। पर तीन साल में उस हल्की टपकन से नींद आने लगी थी। सन्नाटे में वह एक तरह का साथ था।
बाहर दूर कहीं कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया।
सुबह ट्रक आएगा। सामान कल शाम को ही चला गया था। अब सिर्फ वह थी, फर्श पर बिछी पुरानी चादर, और वह चार्जर।
उसने सोचा — उसे उखाड़ लूँ। नए कमरे में काम आएगा।
फिर लगा, रहने दो।
शायद अगला किरायेदार किसी रात उसी सॉकेट में अपना फोन लगाएगा और सुबह उठकर पाएगा कि चार्ज नहीं हुआ। वह झल्लाएगा, एक पल रुकेगा, फिर भूल जाएगा। पुरानी चीज़ें हमेशा तुरंत काम नहीं करतीं — यह उसे भी तीन साल लगे थे समझने में।
नल बंद हो गया।
वह उठी। बल्ब बंद किया, और इस बार नहीं जलाया।
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