1 entry
रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आख़िरी डिब्बा बंद किया।
स्कॉच टेप की चरमराहट रुकी, तो कमरे में बस एक पुराना मफ़लर था — खिड़की के नीचे, दीवार और फ़र्श के बीच की दरार में। उसने उठाया, सोचा, फिर रख दिया।
कमरा खाली था। दीवारें सफ़ेद और थोड़ी पीली उन जगहों पर जहाँ अलमारी और पलंग तीन साल से खड़े थे। टेप के चार निशान थे — किसी ने कभी कुछ लगाया होगा, कोई पोस्टर, कोई कैलेंडर, कोई बच्चे की ड्राइंग — और अब सिर्फ वो चिपचिपे बदरंग धब्बे बचे थे।
उसने एक बार कमरे को नापा। पाँच क़दम चौड़ा, सात लंबा। तीन साल, दो पंखे, एक गीज़र जो कभी-कभी काम करता था।
खिड़की के पास बैठकर उसने थर्मस खोला। चाय ठंडी हो चुकी थी — उस ठंडेपन में जो रात के ग्यारह बजे के बाद किसी भी चीज़ को पकड़ लेती है। उसने पिया फिर भी।
बाहर मोहल्ले में सब बंद था। सड़क के उस पार वाले चाय के ठेले पर एक मोटा पुराना ताला था जिसे वो हर सुबह खुलते देखती थी — उस चाय वाले को जो पहले स्टोव जलाता था, फिर खाँसता था, फिर किसी से बात करता था जो दिखता नहीं था। कल से वो ताला किसी और की आँख से दिखेगा, या शायद वो इस गली से कभी निकलेगी ही नहीं — ये सोचा नहीं।
एक कुत्ता धीरे-धीरे किसी दिशा में जा रहा था, जैसे उसे भी कुछ याद आ रहा हो।
तभी उसकी नज़र एक निशान पर पड़ी जो बाकी तीन से थोड़ा ऊँचा था — लगभग बच्चे की ऊँचाई पर। उसने उँगली लगाई। टेप उखड़ गया था पर वो चिपचिपाहट थी अभी भी।
उसे याद नहीं था किसने लगाया था। वो इस कमरे में अकेले रही थी। बच्चा उसका था नहीं।
शायद पहले वाले किरायेदार का। शायद किसी ने एक काग़ज़ लगाया हो जिसमें सिर्फ एक नाम लिखा था, या एक तस्वीर, या कोई ऐसी बात जो दूसरों को नहीं बतानी थी।
उसने थर्मस बंद किया। रोशनी बुझाई।
अंधेरे में वो निशान नहीं दिखता था। लेकिन वो जानती थी — वो वहाँ है। जैसे कुछ चीज़ें दिखती नहीं, पर रहती हैं।
उसने वो मफ़लर उठाया। इस बार उसने अपने डिब्बे में रख दिया।
#लघुकथा #खाली_कमरा #शहर_की_रात #हिंदी_लेखन