कमरे में एक खाली थर्मस था और दीवार पर टेप के चार निशान।
वह रात के ग्यारह बजे सामान बाँध रही थी। ट्रंक में पहले बर्तन गए, फिर कपड़े, फिर किताबें। किताबों के नीचे से एक पुरानी डायरी निकली — उसमें कुछ नहीं था, बस पहले पन्ने पर एक फ़ोन नंबर लिखा था, जिसके ऊपर किसी ने पेन से लिखा था: ज़रूरत पड़े तो।
नंबर किसका था, याद नहीं आया।
वह उठी और उस कमरे को देखा जिसमें तीन साल रही थी। छत के पास एक जगह पेंट उखड़ा हुआ था — उसने कभी ध्यान नहीं दिया था। खिड़की के बाहर नीम का पेड़ था जो हर बरसात में झुक जाता था। एक बार उसकी एक डाल कमरे तक आ गई थी — उसने उसे भीतर आने दिया था, एक रात के लिए, फिर सुबह काट दिया था। पेड़ से माफ़ी नहीं माँगी थी।
दीवार पर टेप के वे चार निशान उसके लगाए हुए नहीं थे। वे पहले से थे जब वह पहली बार इस कमरे में आई थी, एक गर्म अक्टूबर की शाम को, पीठ पर बैग और हाथ में पानी की बोतल लिए। उसने कभी नहीं पूछा था कि वहाँ क्या टँगा था — तस्वीर, या कैलेंडर, या बस कोई चिट्ठी जिसे किसी ने जल्दी में उखाड़ दिया होगा। अब जाते-जाते लगा कि शायद वे निशान भी किसी की याद थे — किसी रंग की जो धूप में फीकी पड़ गई थी।
थर्मस उठाया — खाली था, जैसी उम्मीद थी। फिर भी एक पल के लिए उसने उसे हिलाया, जैसे कुछ बचा हो भीतर।
बत्ती बुझाई। अंधेरे में कमरे की गंध अलग थी — सीलन नहीं, कुछ और, जिसे अभी तक नाम नहीं मिला था। बाहर किसी के घर में देर रात का कोई धारावाहिक चल रहा था। हँसी की आवाज़ आई, फिर बंद हो गई।
सुबह रिक्शा आने वाला था।
डायरी ट्रंक में नहीं रखी। खिड़की की चौखट पर छोड़ दी — उस इंसान के लिए जो अगले महीने इस कमरे में आएगा, जो शायद वह नंबर कभी मिलाएगा, या नहीं मिलाएगा।
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