त्योहार के अगले दिन सुबह सात बजे मोहल्ले में झाड़ू की आवाज़ पहले उठती है, किसी और चीज़ से...
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त्योहार के अगले दिन सुबह सात बजे मोहल्ले में झाड़ू की आवाज़ पहले उठती है, किसी और चीज़ से...
रात के चार बजकर बाईस मिनट पर प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन पर कुल तीन बेंचें थीं। दो पर ताला पड़ा था। वह...
रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आखिरी कार्डबोर्ड बॉक्स को टेप किया। कमरे में अब सिर्फ एक मैट्रेस बची...
रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आख़िरी डिब्बा बंद किया। स्कॉच टेप की चरमराहट रुकी, तो कमरे में बस एक...
रात के नौ बजे थे जब उसने दीवार से आखिरी तस्वीर उतारी। नीचे टेप के चार पीले निशान रह गए — जैसे किसी...
बस स्टैंड पर सुबह के पाँच बजकर सात मिनट पर कुल चार लोग थे।
एक बूढ़ा आदमी जो ज़मीन पर बोरा बिछाकर आँखें मूँदे बैठा था — सोया था या बस बैठा था, पता नहीं। एक लड़का जो बार-बार मोबाइल की स्क्रीन देखता था, फिर आसमान देखता था, जैसे दोनों जगह से एक ही जवाब माँग रहा हो। और बाहर एक कुत्ता था जो इस सर्दी में भी ज़मीन से चिपका पड़ा था, कान खड़े।
और एक औरत — जो काउंटर की दीवार के सहारे खड़ी थी, हाथ में एक पुरानी चाबी।
चाबी लोहे की थी, पुराने ढाँचे की। गोल सिर, लंबा डंडा — जैसे ताले में दो बार घुमानी पड़ती हो। वह उसे उँगलियों के बीच घुमाती रहती थी। अंगूठे की नाखून से उसकी धार पर रगड़ती। एक आदत, जो उसे खुद याद नहीं थी कि कब से चली आ रही थी।
तभी एक और औरत आई। साड़ी की किनारी गीली थी — बारिश में चली होगी, या नाली छलकी होगी, या बस किस्मत। उसके हाथ में एक छोटा-सा टिफ़िन था, जिसके ढक्कन पर उँगलियों के पुराने निशान थे जैसे बहुत बार खोला और बंद किया गया हो। वह उसी दीवार के पास आकर खड़ी हो गई। दोनों ने एक बार एक-दूसरे को देखा — वह देखना जो न बिल्कुल परिचित था, न बिल्कुल अजनबी।
"कौन सी बस?" साड़ी वाली ने पूछा।
"छह बजे वाली।"
"वही मेरी भी।"
दोनों चुप हो गईं।
पाँच बजकर चालीस पर साड़ी वाली ने टिफ़िन खोला। दो रोटियाँ थीं, थोड़ा अचार। उसने एक रोटी निकाली और बिना कुछ पूछे दूसरी औरत की तरफ बढ़ा दी।
उसने ली। बिना पूछे, बिना मना किए।
बस आई तो दोनों दरवाज़े की तरफ बढ़ीं। साड़ी वाली चढ़ गई। काउंटर वाली दरवाज़े के पास रुक गई — जैसे अभी याद आया हो कि यह उसकी बस नहीं है।
बस चली गई। धुआँ रहा, फिर वह भी नहीं।
उसने हाथ की चाबी देखी। उँगलियाँ उसी पुरानी धार पर थीं, जहाँ हमेशा रहती थीं।
जिस ताले की यह चाबी थी, वह ताला तीन साल पहले टूट गया था। दरवाज़ा तब से बंद नहीं होता था। फिर भी चाबी थी।
शायद इसीलिए वह यहाँ आई थी। या शायद किसी और वजह से।
बूढ़ा आदमी अब भी आँखें मूँदे बैठा था। लड़का जा चुका था।
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