रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आखिरी कार्टन दरवाज़े के बाहर रखा।
तीन साल में यही सीखा था — घर बदलने की भाषा कार्टनों में नहीं होती, उन चीज़ों में होती है जो कार्टन में नहीं जातीं। जैसे वह पुराना Nokia चार्जर, जो दरवाज़े के पीछे ज़मीन पर छूट गया था। उसने उठाया, एक पल देखा, जेब में रख लिया।
कमरा अब खाली था। दीवार पर टेप के चार निशान थे — जहाँ कभी एक कैलेंडर टँगा था, जिसका महीना उसे याद नहीं। एक कोने में पेंट का रंग बाकी दीवार से थोड़ा गहरा था — वहाँ शायद वह पुरानी अलमारी थी, जो वो यहाँ लाया था पर खाली ही छोड़ता रहा। अलमारी तो चली गई। रंग रह गया।
खिड़की के बाहर नीचे वाले फ्लैट की आया किसी बच्चे को लोरी सुना रही थी। आवाज़ धीमी थी, लेकिन शब्द साफ़ आ रहे थे — वही पुरानी लोरी, वही लय, जो उसकी माँ भी गाती थी घर पर, किसी और राग में। उसने सोचा कि इस बात को किसे बताएगा। फिर सोचा — बताने वाली बात है भी या नहीं।
फ़ोन में एक पुरानी बातचीत अभी भी खुली थी। किसी ऐसे की जो पिछले साल इस शहर से चला गया था। आखिरी मैसेज उसी का था, तीन महीने पुराना: जाते वक़्त घर बंद करते हुए एक बार पीछे मुड़कर देखना — सब छूट जाता है, पर कुछ रह जाता है।
उसने तब पढ़कर टाल दिया था। अब लाइट बंद करने से पहले एक बार पीछे मुड़ा।
कमरे में सिर्फ टेप के चार निशान थे। और वह पुरानी खिड़की, जिसका एक कोना अब भी धीरे-धीरे हिल रहा था — हवा नहीं थी, फिर भी।
उसने बत्ती बंद की।
सीढ़ियाँ उतरते हुए उसे जेब में रखा Nokia चार्जर याद आया। उसने सोचा — नई जगह पर यह कहाँ रखूँगा। फिर सोचा — शायद यही एक चीज़ पहले अनपैक होगी।
नीचे से आया की लोरी कब बंद हो गई, उसे पता नहीं चला।
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