रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आख़िरी दराज़ खाली की।
अंदर एक Nokia चार्जर था, जिसकी तार कहीं से टूटी हुई थी। और नीचे एक पुरानी चाबी — काँसे जैसी, थोड़ी हरी पड़ चुकी — जिन तालों में वो लगती थी, वो तालें अब किसी और के घर में थीं। उसे याद नहीं था कि इसे यहाँ कब रखा था, या क्यों रखा था।
उसने दोनों चीज़ें अख़बार में लपेटकर कार्डबॉर्ड बॉक्स में रख दीं।
कमरा अब सिर्फ़ दीवारें था। और दीवारों पर कहीं-कहीं टेप के निशान थे — जहाँ कभी पोस्टर लगे थे, कभी एक कैलेंडर जिसमें कुछ तारीखें गोल-गोल घेरी हुई थीं, कभी शायद कोई काग़ज़ जिसमें कुछ लिखा रहा होगा जो अब याद नहीं। उन निशानों को देखकर लगा कि दीवारें कुछ पूछना चाहती हैं, पर वो जानती थी कि वो नहीं पूछेंगी।
छज्जे की खिड़की खुली थी। बाहर शहर था — नीला-स्याह, अभी नींद में। दूर किसी इमारत पर रंग-बिरंगी लड़ियाँ टँकी थीं, धीमी-धीमी जलती-बुझती। कल स्वतंत्रता दिवस था। बत्तियाँ ऐसी लग रही थीं जैसे किसी ने भूलकर छोड़ दी हों — जश्न की तैयारी में लगाईं, और फिर कोई और काम आ गया।
वो बाहर निकलने लगी तो दरवाज़े के पास रुकी।
एक टेप का निशान था जो बाकियों से थोड़ा नीचे था — बच्चे की ऊँचाई पर। उसे याद नहीं था कि वहाँ क्या लगा था, पर निशान पुराना था, पीला पड़ चुका था। उसने उँगली से उसे छुआ। टेप का किनारा थोड़ा उखड़ने की कोशिश की, पर दीवार ने जाने नहीं दिया।
उसने भी जाने दिया।
सुबह ट्रक आने वाला था। बॉक्स बंद थे, बत्ती बुझी हुई थी। वो थोड़ी देर अँधेरे में खड़ी रही। फिर दरवाज़ा बंद किया और बाहर आ गई। नीचे गली में एक कुत्ता था, जो कहीं से आया था, कहीं जा रहा था।
रात भर वो उस पुरानी चाबी के बारे में सोचती रही — कि किस ताले की थी, और क्या वो ताला अब भी कहीं है।
शायद हाँ। शायद नहीं।
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