रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आखिरी बर्तन कार्डबोर्ड के डिब्बे में रखा।
कमरा अब वैसा नहीं लग रहा था जैसा तीन साल पहले था — जब वो पहली बार दरवाज़े में घुसी थी और सोचा था, यह काम चलेगा। अब दीवारों पर जगह-जगह टेप के निशान थे। कुछ काले, कुछ पीले पड़े हुए। एक निशान पर उसकी नज़र रुकी। वहाँ कभी माँ की तस्वीर लगी थी — वो वाली, जिसमें माँ हँस रही थीं और उनके पीछे गुलमोहर का पेड़ था।
पंखा अभी भी चल रहा था। मकान मालकिन ने बिजली का मीटर कल काटने को कहा था, आज नहीं। तो पंखा चलता रहा — बेमतलब, उस खाली कमरे में जिसमें अब कोई चीज़ नहीं थी जो आवाज़ सोख सके।
कोने में पुराना नोकिया चार्जर पड़ा था। किसका था — उसका, या पहले रहने वाले का — यह वो कभी तय नहीं कर पाई थी। उसे उठाने का मन हुआ। फिर नहीं हुआ। कुछ चीज़ें छोड़ी जाती हैं, बिना किसी ख़ास वजह के।
नींद नहीं आई। दरी अभी बाँधी नहीं थी तो वो उसी पर लेट गई और छत देखती रही। पंखे की आवाज़ एक धीमी लय में थी — लग रहा था जैसे कमरा साँस ले रहा हो, जैसे उसे भी पता हो कि कल से कोई नहीं आएगा, कोई खिड़की नहीं खोलेगा, कोई चाय नहीं बनाएगा।
सुबह ऑटो आने वाला था पाँच बजे।
आँख जब लगी, तो सपने में गुलमोहर का पेड़ था। माँ उसके नीचे खड़ी थीं, हाथ में पुराना थर्मस लिए, कह रही थीं — बेटी, चाय ठंडी हो जाएगी।
जब आँख खुली तो पाँच बज चुके थे। सूरज अभी नहीं निकला था। उसने एक बार दीवार की तरफ़ देखा। टेप का वो निशान — गुलमोहर वाला — अँधेरे में भी दिख रहा था।
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