आज HR ने Q4 appraisal cycle का reminder भेजा। साथ में "internal mobility" form भी था — अगर किसी...
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आज सुबह ऑफिस जाते समय मेट्रो में एक युवक को देखा—शायद पच्चीस-छब्बीस का होगा। फटी हुई जींस, ब्रांडेड टी-शर्ट, और हाथ में नया आईफोन। पूरे रास्ते वह रील्स देखता रहा। मुझे अपनी तीन साल पहले की याद आ गई जब मैं भी ऐसा ही करता था—सैलरी आते ही गैजेट्स पर खर्च कर देना, फिर महीने के आखिर में उधार मांगना। तब लगता था कि यही जीवन है, लेकिन असल में यह सिर्फ दिखावा था।
पिछले हफ्ते मैंने एक गलती की। एक क्लाइंट ने प्रोजेक्ट के लिए पचास हजार का ऑफर दिया। मैंने बिना सोचे हां कर दी क्योंकि रकम अच्छी लग रही थी। लेकिन जब काम शुरू किया तो पता चला कि उसमें तीन गुना मेहनत लगेगी। प्रति घंटे की दर निकाली तो वह मेरी नियमित दर से आधी थी। यह सबक मुझे फिर से याद दिला गया—हर अवसर अच्छा अवसर नहीं होता। पैसा जरूरी है, लेकिन अपने समय और ऊर्जा की कीमत समझना उससे भी ज्यादा जरूरी है।
अब मैं हर ऑफर को तीन मापदंडों पर परखता हूं। पहला: क्या यह काम मेरी दर के अनुसार है? दूसरा: क्या इससे मेरे स्किल्स बढ़ेंगे या पोर्टफोलियो मजबूत होगा? तीसरा: क्या यह क्लाइंट दीर्घकालिक संबंध बना सकता है? अगर तीनों में से दो का जवाब हां नहीं है, तो मैं विनम्रता से मना कर देता हूं। यह कठोर लग सकता है, लेकिन करियर में आगे बढ़ने के लिए नहीं कहना सीखना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हां कहना।
इस हफ्ते मैं एक ठोस कदम उठाऊंगा। मैं अपनी सर्विस की एक स्टैंडर्ड रेट शीट बनाऊंगा—स्पष्ट, लिखित, बिना किसी भ्रम के। उसमें यह भी लिखूंगा कि किस तरह के प्रोजेक्ट मैं नहीं लेता। यह शीट मुझे भावनात्मक निर्णयों से बचाएगी। जब कोई क्लाइंट कहेगा "बस इस बार थोड़ा कम ले लो," तो मैं उसे यह डॉक्यूमेंट दिखा सकूंगा। अपनी मेहनत की कीमत तय करना कोई लालच नहीं, बल्कि आत्मसम्मान है।
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