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आज सुबह कड़ाही में तेल गरम होते वक्त जो धुआँ उठा, उसमें सरसों के तेल की जानी-पहचानी गंध थी — थोड़ी तीखी, थोड़ी कसैली। राई डाली तो पहले ज़ोर से चटकी, फिर एक-एक करके थमने लगी। उस थमने का इंतज़ार रहता है — जब राई चुप हो जाए, तब हींग डालो, एक छोटी चुटकी, कभी ज़्यादा नहीं।
इस हफ्ते की परवल अमीनाबाद मंडी वाले चाचा के यहाँ से ली थी। पतली क़िस्म, बीज अभी नहीं पड़े। मंगलवार को लाई थी, आज गुरुवार है — पर परवल अभी ठीक थे। छोटे, हल्के हरे, दबाने पर थोड़ी कड़क आवाज़। चाचा ने कहा था, "दो-तीन दिन चलेगी, ताज़ी है।" उन्हें पता होता है क्या मौसमी है और क्या नहीं। ऐसी परवल को ज़्यादा मसाले की ज़रूरत नहीं — उनका अपना एक हल्का कसैलापन होता है जो धनिए और तेल के साथ अपनी जगह बना लेता है।
पर आज ग़लती हो गई। दाल वाले बर्तन पर नज़र चली गई और कड़ाही में तेल बहुत गरम हो गया। परवल डाले तो ज़ोर से छनकने लगे — एक तरफ से जल्दी भुन गए। घबराई और दो छींटे पानी के डाले। कड़ाही झनझनाई, भाप तेज़ उठी। आगे जलने से रुका, पर उस भूनेपन का रूखापन सब्ज़ी में रह गया। नमक भी देर से पड़ा — ऊपर-ऊपर बैठा, अंदर तक नहीं उतरा।
पहला निवाला लिया तो मुँह में हल्का कुरकुर था — ऊपर से थोड़ा सख्त, अंदर से मुलायम और नम। चबाते वक्त वो हल्का कसैला ज़ायका आया जिसे नानी "असली स्वाद" कहती थीं। पूर्वी यूपी के उनके उस क़स्बे में परवल हमेशा सरसों के तेल में बनती थी — बिना टमाटर, बिना ज़्यादा मिर्च। आज वैसा ही हुआ, अनजाने में।
अफसोस धनिए का है। सब्ज़ी थाली में पहुँच चुकी थी, तब याद आया। कच्ची खुशबू तो उठी जब ऊपर से डाला, पर भुने हुए धनिए का जो गहरा मटियाला स्वाद होता है — जो रोटी के साथ पीछे से आता है — वो नहीं आया। अगली बार आधा धनिया पहले डालूँगी जब सब्ज़ी गर्म हो, और आधा उतारते वक्त। इस बार ठीक उतरी, पर पूरी तरह नहीं।
रात की थाली में परवल के साथ मसूर की पतली दाल थी और एक खाली कोना। उस कोने में कभी अचार रखती हूँ, कभी नींबू। आज कुछ नहीं रखा — उठने का मन नहीं हुआ, या शायद वैसे ही ठीक था।
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