कड़ाही में जीरा डाला तो छनकने की जगह धुआँ उठा — तेल ज़्यादा गरम हो गया था। जल्दी से आँच कम की, पर जीरे का रंग थोड़ा गहरा हो चुका था। उस जले हुए जीरे की हल्की कड़वाहट बाद में याद आती है, पहले कौर में नहीं।
आज भिंडी थी — इस हफ्ते अमीनाबाद की मंडी में रामकिशन अंकल ने बिल्कुल पतली वाली दी। बोले, कल सुबह की तोड़ी हुई है, बस डेढ़ किलो बची थी, ले लो। पतली भिंडी में बीज कम होते हैं — चबाते वक्त वो झुनझुनी नहीं आती जो मोटी, देर से तोड़ी हुई भिंडी में आती है। इसे सूखी बनाना था, आज प्याज़-टमाटर का मन नहीं था — सिर्फ हींग, जीरा, धनिया पाउडर, और थोड़ी लाल मिर्च।
जीरे का रंग चूँकि गहरा था, तो सोचा भिंडी में कुरकुरापन लाने के लिए थोड़ा बेसन छिड़कूँ — एक छोटे चम्मच से भी कम। कड़ाही में डाली तो पहले छन-छन की आवाज़ आई, तेज़, फिर धीमी होती गई, और एक सोंधी खुशबू उठी। नानी बलरामपुर में कहती थीं — भिंडी को बीच में मत छुओ, वो खुद बताती है कब पलटनी है। यहाँ लखनऊ में अगस्त की नमी में वो कुरकुरापन जल्दी जाता है। सात-आठ मिनट बाद ढककर बैठाना पड़ा।
हींग कम पड़ गई इस बार। डिब्बे का पेंदा खाली था, जो बचा था वो डाल दिया — पर जो बाद का स्वाद गले में थोड़ी देर ठहरता है, वो पीछे रह गया। नमक ठीक था, धनिया पाउडर ठीक था, पर हींग की कमी पूरी तरह छुपाई नहीं जा सकती। अगली बार किराने वाले से पहले ही माँग लूँगी।
तीनों ने खाना खाया, किसी ने कुछ नहीं कहा — इसका मतलब ठीक था। घर में जब कुछ बहुत अच्छा बनता है तो लोग बताते हैं, और जब बुरा बनता है तो भी बताते हैं। बीच की चुप्पी यही कहती है कि चला। बचा खाना नहीं था, कल के लिए सोचना पड़ेगा।
कल रविवार है — मंडी जाऊँगी। परवल दिख रहे थे इस बार, थोड़े महँगे पर मौसम का आखिरी दौर है शायद। परवल की हल्की कड़वाहट दही वाली ग्रेवी में कहाँ चली जाती है, पता ही नहीं चलता। नानी आलू मिलाती थीं, मैं नहीं मिलाती — तीन के लिए बनाती हूँ तो भरावन बिना भी थाली भर जाती है।
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