रात साढ़े दस बजे, बारिश की आवाज़ जब छत पर एकसी हो आई थी, Kumar Gandharva के एक Kabir भजन में वह...
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रात साढ़े दस बजे, बारिश की आवाज़ जब छत पर एकसी हो आई थी, Kumar Gandharva के एक Kabir भजन में वह...
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रात के क़रीब दस बजे थे, बाहर बारिश हल्की थी — खिड़की बंद, headphones पर — जब Kumar Gandharva की आवाज़ में एक ऐसा पल आया जो मुझे थामे रखा। Bhairavi जैसे किसी रंग में एक विलंबित आरोह, जहाँ वो एक स्वर पर ठहरते हैं — ज़रूरत से दो पल ज़्यादा — और फिर बिना किसी drama के नीचे उतर जाते हैं। यह निर्णय listener को तब समझ में आता है जब वो लम्हा पहले ही जा चुका होता है।
मैं Pandit Kumar Gandharva के Malwa लोक-गीतों के एक पुराने संकलन को सुन रहा था — शायद 1970 के आसपास की HMV recording, सुनी-सुनाई बात है कि tracks अलग-अलग sessions में बनाए गए थे। Recording mono है — आवाज़ एक ओर से आती है, और उसमें sarangi व tabla ambient नहीं, बल्कि एक-दूसरे से बात करते हुए हैं। Kumar-ji की आवाज़ में एक ख़ास roughness है जो किसी कमी जैसी नहीं लगती — वो texture जो tuberculosis के बाद बची रही, और जिसे उन्होंने हानि की जगह एक अलग भाषा में बदल लिया।
यह लोक-संगीत की formal recording है, शास्त्रीय प्रस्तुति नहीं — और यह अंतर ज़रूरी है। Kumar Gandharva यहाँ तिहाई नहीं लगाते; bandish के नियमों की जगह धुन का स्वाभाविक रंग बोलता है। एक गीत में — शीर्षक ठीक-ठीक याद नहीं — rhythm एक beat पीछे खिसक जाती है और tabla बिना झिझक उनके साथ चला जाता है। Rehearsed था या spontaneous, बताना मुश्किल है। लेकिन उस खिंचाव में एक ईमानदारी है जो planned नहीं लगती।
जो यह recording नहीं करती — और शायद करना भी नहीं चाहती थी — वो है तकनीक का प्रदर्शन। लेकिन दो-तीन गीतों में मुझे ऐसा सुनाई दिया कि शब्द और melody के बीच एक हल्का फ़ासला रह गया — जैसे धुन अर्थ से थोड़ा आगे निकल गई। हो सकता है यह recording की सीमा हो, हो सकता है मेरी अपनी समझ की कमी हो।
तीसरी बार सुनने पर एक बात खुली — उनकी बीच-बीच की गुनगुनाहट, जो कुछ अंतरों के बाद आती है, filler नहीं है। वो वो जगह है जहाँ वो listener को बिना कुछ कहे साथ खींच लेते हैं।
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