रात के कोई साढ़े नौ बजे, Riyaz के यहाँ उसके पुराने टर्नटेबल पर सुई उतरी। Pandit Bhimsen Joshi की Puriya Dhanashri — ख़याल गायकी, HMV का vinyl, शायद 1970 के दशक का, Riyaz को भी ठीक नहीं पता।
पहले कुछ मिनट सिर्फ़ आलाप थे। और उस आलाप में एक जगह — मध्यम पर एक ठहराव, दो बीट से कुछ ज़्यादा — मुझे ऐसा सुनाई दिया जैसे गला कुछ कहना भूल गया हो, फिर याद आ गया। यही वो लम्हा था जब बाक़ी सब कुछ उस कमरे से बाहर निकल गया।
Puriya Dhanashri की बनावट सीधी नहीं है। Puriya का एक अंतर्मुखी संकोच है, Dhanashri का एक हल्का-सा विस्तार — और Bhimsen जी इन दोनों के बीच रहते हैं उस recording में, किसी एक पर स्थिर नहीं होते। Headphones नहीं थे उस रात, speakers थे, और vinyl की surface noise रह-रहकर याद दिलाती रही कि यह कोई clean digital file नहीं है। मुझे आज भी समझ नहीं आता कि वो noise recording को नुक़सान पहुँचाती है या उसमें एक तरह की साँस भरती है।
जहाँ यह recording मुझ तक पूरी तरह नहीं पहुँची — वो bada khayal का विस्तार था। गायकी का शिल्प बिल्कुल वहाँ है, लेकिन तान की रफ़्तार एक जगह ऐसी लगती है जैसे studio session का कोई दबाव था। यह कोई आरोप नहीं है — यह उस recording की अपनी सीमा है, जिसे वो शायद ख़ुद जानती है।
Riyaz ने बाद में chai रखी। हम देर तक बैठे रहे — recording की नहीं, बस उस रात की।
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