आज सुबह एक बंडल खोला जो पिछले तीन हफ्तों से मेज़ के कोने में रखा था। संख्या थी RR-1847-223, जयपुर रियासत के सांगानेर परगने से आया हुआ राजस्व रिकॉर्ड। कागज़ पीला, भुरभुरा, किनारे दाँतेदार — बाँधने वाली सूती डोर अभी भी बाकी थी, हालाँकि बीच में एक गाँठ नई लग रही थी, शायद किसी पिछली जाँच के वक्त। पहले पन्ने पर एक नाम था: "रामदीनी, पत्नी हरिराम, बनिया।" बस इतना। पूरी बही में उसका नाम फिर नहीं आता।
19वीं सदी की इस बही में दर्ज है कि सन् 1847 में सांगानेर परगने में घी का भाव तीन आने प्रति सेर था। 1840 के एक अन्य राजस्व रिकॉर्ड में वही भाव एक आना था — सात साल में तीन गुना। मैं अनुमान लगा रही हूँ कि उस साल खरीफ की फ़सल बुरी रही होगी, शायद आस-पास के परगनों में भी, लेकिन बही में कोई कारण दर्ज नहीं। यह अनुमान है, तथ्य नहीं।
रामदीनी का नाम मुख्य पाठ में नहीं, एक हाशिये पर है — और लिखावट मुख्य लिपिक की नहीं। यह दूसरा हाथ है, थोड़ा कँपकँपाया हुआ, दबाव असमान। शायद उसने खुद लिखा हो, शायद किसी ने उसके लिए। जो ज्ञात है: यह नाम एक संपत्ति विवाद के संदर्भ में दर्ज हुआ। जो अज्ञात है: विवाद किस बात पर था, और आखिर में क्या हुआ। मैंने आज उस पन्ने की तस्वीर ली और फ़ाइल में लिखा: "विवरण अधूरा — सम्बन्धित बस्ते की जाँच बाकी।"
एक बात और — हाशिये पर उसके नाम के नीचे एक और शब्द था, आधा मिटा हुआ। "साक्षी" हो सकता है, "शिकायत" भी हो सकता है। इन्फ्रारेड स्कैन के बिना तय करना मुश्किल है। मैंने अनुरोध फ़ॉर्म भर दिया है, लेकिन उसमें छह हफ्ते लगते हैं।
शाम को चौरा रास्ते से लौटते हुए एक बुज़ुर्ग दुकानदार मिले जो पास की एक पुरानी हवेली के बारे में बात कर रहे थे। उन्होंने उसे "हरिराम बनिया की गली" कहा। मैं एक पल रुक गई — लेकिन जयपुर में यह नाम असामान्य नहीं। ज़रूरी नहीं कि वही परिवार हो। मैंने नोटबुक में लिखा: "संयोग? जाँचना।" और आगे चल दी।
रामदीनी का क्या हुआ — बही नहीं बताती। वह नाम एक हाशिये पर है और वहीं रह गया।
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