आज कैटलॉगिंग कक्ष में एक बही खोली जो शायद 1870-80 के दशक की है — जयपुर रियासत के एक राजस्व रिकॉर्ड के साथ रखी थी, पर ख़ुद उसमें किसी सरकारी दफ़्तर का नाम नहीं। पन्ने पीले और भुरभुरे हो चुके हैं, कई जगह हाशिये का कागज़ घिस गया है। मुख्य लेखक ने साफ़ नस्तालीक़ में हिसाब-किताब लिखा है, लेकिन बीच-बीच में एक दूसरे हाथ की लिखावट घुसी हुई है — अनिश्चित, थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी, जैसे कोई अभी-अभी लिखना सीख रहा हो। यह टिप्पणियाँ हाशिये पर हैं, कभी-कभी मुख्य हिसाब की पंक्तियों के बीच भी।
एक पन्ने पर घी की क़ीमत दर्ज है: "घी — ३ आने सेर।" तारीख़ मिटी हुई है। उसी पन्ने पर उस दूसरे हाथ ने हाशिये में लिखा है: "बाज़ार में नहीं मिला।" बस इतना। न कारण, न तारीख़, न कोई और सूचना। जो ज्ञात है: क़ीमत तीन आने थी और घी उपलब्ध नहीं था। जो अज्ञात है: यह किस साल की बात है, कोई अकाल था या बस किसी एक दिन की कमी। जो मैं अनुमान लगा रही हूँ: हो सकता है वह दूसरा हाथ घर का था — कोई स्त्री जो हिसाब देखती थी और बाज़ार भी जाती थी।
उसी बही में एक नाम बार-बार आता है — "लक्ष्मी, कातिब की पत्नी।" पूरा नाम कहीं नहीं। कातिब का नाम हर जगह है, उसका नहीं — सिवाय उन दो जगहों के जहाँ उसने ख़ुद कोई रक़म चुकाई या प्राप्त की है। वहाँ उसके दस्तखत हैं — अँगूठे का निशान नहीं, असली हस्ताक्षर, देवनागरी में "लक्ष्मी"। यह उल्लेखनीय है, यद्यपि मैं इससे कोई बड़ा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहती। यह बस एक तथ्य है।
बही के आख़िरी पाँच पन्ने खाली हैं। किसी ने उन्हें भरा नहीं। इसका अर्थ मुझे नहीं पता — हो सकता है परिवार बदल गया, हो सकता है कातिब चला गया, हो सकता है बही किसी वजह से बीच में बंद हो गई। यह "हो सकता है" ही मेरे पास है।
घर लौटते हुए चौड़ा रास्ते पर एक दुकान के बाहर घी की तख़्ती देखी — अब ५०० रुपये किलो। मैंने उस बही के ३ आने याद किए। इन दोनों के बीच कितनी पीढ़ियाँ, कितने अकाल, कितने बाज़ार आए-गए — यह हिसाब मेरे बस का नहीं।
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