आज सुबह एक पुरानी बही मेरे हाथ आई — जयपुर रियासत के एक राजस्व रिकॉर्ड से, संभवतः 1847-48 के आसपास की, हालाँकि तारीख की पुष्टि अभी नहीं हुई। कागज़ भूरा पड़ चुका था, हाशिये पर किसी दूसरे हाथ की लिखावट थी — छोटे-छोटे अक्षर, जैसे कोई सोचते हुए लिख रहा हो। मुख्य मुंशी ने जो दर्ज किया था वह अलग था; यह टिप्पणी बाद में जोड़ी गई थी, शायद किसी जाँच के दौरान।
उस हाशिये पर लिखा था: "घी चार आने सेर, बाज़ार बंद दो दिन।" बस इतना। कोई तारीख नहीं, कोई नाम नहीं। लेकिन यह एक तथ्य है — जो ज्ञात है। क्यों बाज़ार बंद था, यह अज्ञात है। मेरा अनुमान है कि उस साल किसी स्थानीय उथल-पुथल का असर था, क्योंकि उसी रजिस्टर में तीन महीने का हिसाब अचानक रुका हुआ दिखता है।
जो मुझे रोकता है वह नाम नहीं, यह चुप्पी है। मुख्य बही में किसानों के नाम हैं — रामलाल, हरिया, भवानी देव — लेकिन वह हाशिये वाली लिखावट किसकी है, यह कभी पता नहीं चलेगा। शायद कोई छोटा क्लर्क था जो बाज़ार के भाव नोट करता था अपनी ज़रूरत के लिए। या शायद कोई जाँचकर्ता। यह अनुमान है।
शाम को चौड़ा रास्ता से लौटते हुए एक किराने की दुकान पर रुकी। घी की क़ीमत बोर्ड पर लिखी थी — आज के हिसाब से। वह चार आने वाला ज़माना और यह ज़माना, दोनों के बीच जो खाई है उसे मैं नापने में असमर्थ हूँ। यह कोई सबक नहीं है, बस एक दूरी है जो मुझे दिखी।
नोटबुक में पेंसिल से लिखा: "बही नं. 7, हाशिया, अज्ञात हस्त।" कल फिर देखूँगी।
#अभिलेखागार #दस्तावेज़ #रोज़मर्रा_का_इतिहास #जयपुर