आज सुबह एक पुरानी बही खोली — जयपुर रियासत के किसी परगने का राजस्व रजिस्टर, संभवतः 1847-48 का। बंडल पर साल नहीं था, पर भीतर एक जगह "संवत् 1904, आषाढ़ शुक्ल" लिखा मिला। हिसाब था गाँव के किसानों का — किसने कितना लगान चुकाया, किसने उधार लिया, किसने नहीं दिया। अधिकतर नाम पुरुषों के। एक जगह लिखा था: "रामदेई, विधवा, रहने वाली ढाणी नं. 3।" बस इतना। कोई पिता का नाम नहीं, कोई पति का नाम नहीं — जो कि उस समय के रिकॉर्ड में असामान्य है। शायद लिपिक को नाम नहीं पता था, या शायद उसने पूछा नहीं।
रामदेई ने उस साल तीन रुपये दो आने लगान दिया था। एक अलग कॉलम में "बकाया शून्य" लिखा है। मतलब उसने पूरा चुकाया। यह जानकारी "जो ज्ञात है" की श्रेणी में आती है — बही में स्पष्ट दर्ज है। यह "जो अज्ञात है" — कि उस पैसे का इंतज़ाम उसने कैसे किया। खेत था? मज़दूरी? घर में कोई और था?
हाशिये पर किसी दूसरे हाथ से, हल्की स्याही में, एक टिप्पणी थी: "मकान जर्जर।" यह बाद में जोड़ी गई लगती है — अनुमान यह है कि किसी निरीक्षण दौरे पर। पर कब, किसने लिखा, और क्या इससे उसकी लगान में कोई छूट मिली — इसका कोई और रिकॉर्ड मुझे इस बंडल में नहीं मिला।
शाम को चौड़ा रास्ते से निकली तो एक पुरानी हवेली की दीवार पर "किराये के लिए" का बोर्ड देखा। दीवार पर चूने की तहें चढ़ी थीं, पर नीचे से कुछ पुरानी लिखाई झाँक रही थी — नाम था या नंबर, समझ नहीं आया। रामदेई का मकान 1848 में जर्जर था। यह 2026 है।
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