आज दोपहर को एक पुरानी बही के भीतर से एक मुड़ा हुआ कागज़ निकला — शायद किसी ने उसे बाद में रखा था, या...
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आज दोपहर को एक पुरानी बही के भीतर से एक मुड़ा हुआ कागज़ निकला — शायद किसी ने उसे बाद में रखा था, या...
आज सुबह संरक्षण कक्ष में एक बही खोली जो 19वीं सदी की है — शायद 1838 से 1845 के बीच की, हालाँकि...
आज दोपहर को एक पुरानी बही उठाई — 1847 की, जयपुर रियासत के राजस्व विभाग की। कागज़ पीला और कुछ जगहों...
आज सुबह जब मैंने सन् 1847 की एक बही खोली — जयपुर रियासत के राजस्व विभाग की, परगना सांगानेर की — तो...
आज सुबह जब मैंने 1847 की एक बही खोली — जयपुर रियासत के एक परगने का घरेलू हिसाब — तो बीच के कुछ...
आज सुबह जो बही खुली — जयपुर रियासत के राजस्व विभाग की, अनुमानतः 1847-48 की — उसके कागज़ इतने भुरभुरे थे कि मैंने पहले उन्हें पॉलिएस्टर टीशू पर रखा, तब पलटा। बाईं ओर के हाशिये पर, मुख्य लिपिक की लिखावट से अलग, किसी दूसरे हाथ ने लिखा था:
"रामी का बकाया — ३ आने"
नाम, रकम, बस इतना। रामी कौन थी — यह बही नहीं बताती।
मुख्य प्रविष्टियाँ एक ग्राम के भूमि-बंदोबस्त से संबंधित हैं। जो ज्ञात है: उस वर्ष के रिकॉर्ड में तीन पुरुष नाम दर्ज हैं — मालिक, गवाह, मुंशी। जो अज्ञात है: रामी का इन प्रविष्टियों से संबंध क्या था। जो मैं अनुमान लगा रही हूँ: तीन आने उस समय कुछ घंटों की मज़दूरी के बराबर रहे होंगे — पर इस बही में कोई दर-सूची नहीं मिली, इसलिए यह सिर्फ अनुमान है।
हाशिये की यह लिखावट बाद में जोड़ी गई लगती है। स्याही का रंग मुख्य पाठ से थोड़ा अलग है, अक्षर भी छोटे और जल्दी में लिखे हुए हैं। हो सकता है किसी ने अपनी याददाश्त के लिए नोट किया हो — कोई लेन-देन जो पूरा होना चाहिए था। पर वह पूरा हुआ या नहीं, इसका कोई और निशान उस बही में नहीं है।
उसी बही के एक और पन्ने पर एक तारीख दो जगह अलग लिखी मिली — एक बार सं. 1904, एक बार सं. 1905 (विक्रमी संवत)। दोनों एक ही हस्ताक्षर के नीचे। यह लिपिक की चूक है या बाद का सुधार — इस संदर्भ में तय कहना मुश्किल है। मैंने फ़ाइल नोट में दोनों दर्ज कर दिए, टिप्पणी के साथ।
घर लौटते हुए, चौरा रास्ते पर, एक पुरानी हलवाई की दुकान के आगे रुकी। बोर्ड पर लिखा था: "पुराना हलवाई — 1932 से।" 1932 से अब तक कितनी पीढ़ियाँ, कितने हिसाब। उनकी अपनी बहियाँ कहाँ होंगी — यह सोचते हुए चलती रही।
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