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anaya
@anaya

May 2026

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5Tuesday

आज सुबह स्टाफ रूम में नताशा मैम बोल रही थीं — पाँच बजे उठकर एक घंटा वर्कआउट, तब कहीं जाकर दिन की शुरुआत ठीक लगती है उन्हें। बात उनसे थी, मेरे बारे में नहीं। फिर भी कंधों में एक जकड़न आ गई — वह जकड़न जो तुलना से आती है, थकान से नहीं। मैंने तीनों को अलग रखने की कोशिश की: शरीर बोला (कंधे), विचार आया (तू ऐसा क्यों नहीं कर पाती?), और भावना थी एक पुरानी धारणा का वज़न — कि सुबह उत्पादक न हो, तो दिन जैसे हुआ ही नहीं।

वह धारणा मैंने खुद नहीं चुनी थी, पर वह मेरे कंधों को पहचानती है। अभी उसे बदलने का कोई इरादा नहीं — बस यह देखना है कि वह कहाँ-कहाँ दिखती है।

इस हफ्ते का प्रयोग — रात ग्यारह बजे से पहले स्क्रीन बंद, कमरे की बत्ती धीमी, सुबह की पहली चाय बिना फ़ोन के। चार दिन पूरे हो गए।

  • नींद: थोड़ी जल्दी आती है, पर रात तीन बजे एक बार आँख खुल जाती है।
  • सुबह का मूड: कल ठीक था, आज neutral — कोई pattern अभी साफ नहीं।
  • jaw: सुबह tight रहता है, चाहे रात अच्छी हो या न हो।

शायद jaw का संबंध नींद से उतना नहीं जितना किसी pending काम से है — वह काम जो consciously याद नहीं, पर दिमाग़ रात को अपने आप process करता रहता है। अभी यह सिर्फ एक अनुमान है, data नहीं।

एक सवाल जो आज बना रहा: क्या मैं अपनी सुबह को "ठीक" रखने की कोशिश कर रही हूँ, या बस देख रही हूँ? दोनों में फर्क है।

अगले तीन दिन jaw पर ध्यान रखूँगी — खासकर किसी session से पहले के उस छोटे से पल में। कुछ और तय नहीं करना अभी।

#आत्मचिंतन #छोटे_प्रयोग #नींद_और_मूड #मन_की_डायरी

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17Sunday

आज सुबह पड़ोसन के घर से बच्चे के रोने की आवाज़ आई — लंबी, थकी हुई, वो जो सिर्फ थकान से निकलती है, किसी चोट से नहीं। मैं बालकनी में बैठी थी, चाय का आखिरी घूंट अभी बचा था। आवाज़ पहुँचते ही कंधे ऊपर चढ़ गए — यह मेरे notice करने से पहले हुआ। फिर एक विचार आया: "कुछ करना चाहिए।" और उसके ठीक नीचे एक feeling — वो हल्की बेचैनी जो रविवार की सुबह को थोड़ा तोड़ देती है।

मैं रुकी। कंधे consciously नीचे किए। एक मिनट में बच्चा चुप हो गया था। पर वो "ठीक करो" वाला reflex — वो मेरे अंदर थोड़ी देर और बना रहा। interesting है यह — body ने signal दिया, mind ने कहानी बनाई, और feeling उस कहानी से चिपक गई। तीनों अलग थे, पर मैं उन्हें एक ही समझ रही थी।

पिछले हफ्ते का प्रयोग था: रात 9 बजे के बाद कोई screen नहीं। hypothesis यह था कि सोने से पहले की anxiety कम होगी और सुबह की पहली feeling बेहतर होगी। period: 7 दिन। check करने का तरीका: उठते ही पहले 10 मिनट का mood एक शब्द में लिखना।

नतीजा अजीब रहा। 4 दिन ठीक थे — आँखें हल्की थीं, जबड़ा ढीला, पहली feeling "शांत" या "हल्की" थी। पर 3 दिन नींद देर से आई, जैसे screen हटा दी और दिमाग़ को नहीं पता था अब कहाँ जाए। हो सकता है screen एक noise थी जो किसी और noise को दबाए बैठी थी। removal से वो noise गई नहीं, बस दिखने लगी। अभी यह मान लेती हूँ — पक्का नहीं।

तो अगला trial: 9 बजे के बाद screen नहीं, और उसकी जगह कुछ — 10 मिनट खिड़की के पास बैठना, कुछ नहीं करना। hypothesis: transition चाहिए, सिर्फ removal नहीं। इस हफ्ते देखती हूँ कि replacement से कुछ बदलता है या नहीं। रोज़ वही एक शब्द लिखूँगी।

एक सवाल जो आज रह गया: वो "ठीक करो" reflex — वो मेरी ताकत है या सिर्फ पुरानी आदत? शायद दोनों एक साथ हो सकते हैं। अभी नहीं जानती।

कल observe करना है कि "कुछ नहीं करने" में कितनी देर बाद असली शांति आती है — या आती है भी।

#आत्मचिंतन #छोटे_प्रयोग #नींद_और_मन #जर्नलिंग

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