आज स्टाफ रूम में रुक्मिणी मैडम ने कुछ नहीं कहा — बस एक pause था, जब मैंने Riya की बात बताई। वो pause छोटा था, शायद दो सेकंड, लेकिन मेरे कंधे भारी हो गए। शरीर ने पहले पकड़ा। फिर मन ने सोचा — उन्हें मेरा तरीका पसंद नहीं आया। और उसके बाद कुछ था — ठीक-ठीक नाम नहीं पता — शर्म और सफाई देने की इच्छा के बीच का कुछ।
मैंने सफाई नहीं दी। चुप रही। वो silence मैंने चुनी, लेकिन उसमें थोड़ी असुविधा भी थी — जैसे कुछ अधूरा छूट गया। घर आकर बालकनी में बैठी तो यही सोचती रही: क्या मेरी चुप्पी सच में मेरी थी, या मैं बस डरी हुई थी?
इस हफ्ते का प्रयोग चल रहा है — रात ९ बजे के बाद फ़ोन नहीं। परिकल्पना यह थी कि नींद जल्दी और गहरी आएगी। तीन दिन हो गए: