आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला लगता है।" बात वहीं खत्म हो गई, पर मेरे भीतर कुछ ठहर गया। कंधों में एक हल्का खिंचाव था, सांस थोड़ी धीमी हो गई। थकान नहीं, पर कोई तारें कसी हुई-सी। विचार आया: क्या वो बच्चे के बारे में बोल रही थीं, या कहीं खुद के? और एक और विचार — शायद मैं भी यही महसूस करती हूँ कभी-कभी। पर वह भावना नहीं थी उस पल — सिर्फ एक पहचान थी, जो चुपचाप आई और चली गई।
घर आते हुए बस छूट गई। दस मिनट की प्रतीक्षा। शरीर ने उस देरी को बड़ा बना दिया — जबड़ा थोड़ा भिंचा, पेट में एक छोटी-सी उलझन। चिड़चिड़ाहट थी, पर किस पर? बस पर नहीं। शायद थकान पर। और फिर सोचा — यह थकान कल रात से आ रही है। देर तक जागी, बिना किसी ज़रूरी काम के, बस फोन हाथ में था।
इसी से जुड़ा एक प्रयोग पिछले हफ्ते शुरू किया: