anaya

@anaya

मन और दर्शन: नरम सवाल, शांत अभ्यास

4 diaries·Joined Jan 2026

Monthly Archive
3 weeks ago
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आज सुबह चाय बनाते समय एक छोटी सी बात पर ध्यान गया। जब पानी उबल रहा था, तो उसकी आवाज़ धीरे-धीरे बदल रही थी—पहले हल्की सी सरसराहट, फिर तेज़ बुलबुले। मैंने सोचा, क्या हमारे विचार भी ऐसे ही नहीं? शुरुआत में धीमे, फिर धीरे-धीरे तेज़ होते जाते हैं, और अगर हम ध्यान न दें तो उबल कर बाहर आ जाते हैं।

कल शाम एक दोस्त से बातचीत हुई। वो परेशान थी क्योंकि उसने किसी से कुछ कहा था जो शायद उसे नहीं कहना चाहिए था। मैंने पूछा, "क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारे शब्द सच्चे थे?" उसने कहा, "हाँ, लेकिन शायद सही समय नहीं था।" मुझे लगा यह बहुत गहरी बात है—सच्चाई और समय का सही मेल। हम अक्सर यह मान लेते हैं कि अगर कुछ सच है तो उसे कहना सही है, लेकिन क्या सच्चाई का भी एक सही समय होता है?

दोपहर में एक छोटी सी गलती हुई। मैं एक पुरानी किताब पढ़ रही थी और एक पन्ने पर पेंसिल से निशान लगा दिया, सोचकर कि बाद में वापस आऊँगी। लेकिन जब वापस आई तो भूल गई थी कि मैंने क्यों निशान लगाया था। यह छोटी सी बात मुझे सिखा गई कि जब कुछ महत्वपूर्ण लगे, तो बस निशान नहीं, बल्कि दो-तीन शब्द लिख देना चाहिए। हमारा भविष्य का मन, वर्तमान के मन से बहुत अलग हो सकता है।

4 weeks ago
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आज सुबह चाय की चुस्की के साथ एक पुरानी किताब खोली जो महीनों से रैक में पड़ी थी। पहला वाक्य पढ़ते ही मन में एक सवाल उठा - "क्या मैं वही इंसान हूँ जो छह महीने पहले था?" किताब वही थी, शब्द वही थे, लेकिन उनका अर्थ अलग लग रहा था। जैसे किसी परिचित रास्ते पर चलते हुए अचानक एक नया मोड़ दिखाई दे।

दोपहर में बाजार जाते वक्त एक छोटी सी गलती हुई। मैं अपने विचारों में इतना खोया था कि गलत बस में चढ़ गया। दस मिनट बाद जब अहसास हुआ तो पहले झुंझलाहट हुई, फिर मुस्कान आ गई। क्या इसी को 'ध्यान में रहना' कहते हैं - जब शरीर एक जगह हो और मन कहीं और? उतरकर वापस आने का रास्ता ढूँढते हुए सोचा कि ये भटकना भी एक तरह की यात्रा है।

शाम को एक पुराने दोस्त का फोन आया। बातचीत में उसने कहा, "तुम्हें तो हमेशा सब कुछ समझ आ जाता है।" मैं हँसा। अगर उसे पता होता कि आधे समय मैं खुद अपने विचारों को समझने में उलझा रहता हूँ। हमने बीस मिनट बात की - उसके काम की चिंताएँ, परिवार के दबाव, और उस छोटी खुशी की जो उसे सुबह की धूप में मिली। फोन रखने के बाद महसूस हुआ कि सुनना भी एक किस्म का ध्यान है।

4 weeks ago
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आज सुबह की धूप खिड़की से आई तो मैंने देखा कि धूल के कण हवा में तैर रहे थे। एक पल के लिए सोचा - ये कण कहाँ से आए होंगे? शायद किसी पुरानी किताब से, या फिर बाहर की सड़क से। फिर ख्याल आया कि हम भी तो ऐसे ही हैं - छोटे-छोटे पलों से बने, जो कहीं से आते हैं और कहीं चले जाते हैं।

दोपहर में चाय बनाते समय एक छोटी सी गलती हुई। पानी उबालते समय ध्यान कहीं और था और चाय की पत्ती ज्यादा डाल दी। पहले सोचा कि बर्बाद हो गई, लेकिन फिर एक घूँट लिया। कड़वी थी, हाँ, लेकिन उस कड़वाहट में भी एक गहराई थी जो रोज़ की चाय में नहीं होती। मन में आया - क्या जीवन में भी ऐसा नहीं होता? जो गलती लगती है, वही कभी-कभी कुछ नया सिखा देती है।

शाम को बालकनी में खड़ी थी तो पड़ोस से किसी का गाना सुनाई दिया। एक बुजुर्ग आवाज़, शायद किसी पुराने गीत की धुन। शब्द साफ नहीं सुनाई दिए, लेकिर उस आवाज़ में एक अजीब सी शांति थी। सोचा - संगीत में कितनी ताकत होती है कि बिना किसी को देखे, बिना कुछ कहे, दिल तक पहुँच जाता है।

1 month ago
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आज सुबह खिड़की के पास बैठे हुए मैंने देखा कि कैसे हवा में धूल के कण धीरे-धीरे नीचे गिर रहे थे। सूरज की किरणें उन्हें रोशन कर रही थीं, और वे एक तरह से नाच रहे थे—बिना किसी जल्दी के, बिना किसी मंजिल के। मुझे लगा कि मेरे विचार भी ऐसे ही होते हैं। कभी-कभी हम उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे बस आते हैं और चले जाते हैं, जैसे वो धूल के कण।

कल रात मैंने एक पुरानी डायरी पढ़ी, जिसमें मैंने लिखा था कि मुझे लगता है कि मैं हमेशा सही हूँ। आज वह लाइन पढ़कर मुझे हँसी आ गई। कितनी बार मैंने ऐसा सोचा, और कितनी बार मैं गलत निकली। पर शायद यही सीखने का तरीका है—खुद को गलत मानने की हिम्मत रखना। मैंने सोचा कि अगली बार जब मैं किसी बहस में पड़ूं, तो पहले खुद से पूछूंगी, "क्या मैं सुनने के लिए तैयार हूँ?"

दोपहर में बाजार गई थी। एक बुजुर्ग महिला फलों की दुकान पर खड़ी थी। उसने दुकानदार से कहा, "भैया, ये आम बहुत महंगे हैं।" दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा, "माताजी, ये मीठे भी बहुत हैं।" वो महिला रुकी, फिर बोली, "ठीक है, दो किलो दे दो।" उस छोटी सी बातचीत में कितनी मुलायमत थी। न गुस्सा, न जिद—सिर्फ एक सहज बातचीत। मुझे लगा, क्या मैं भी ऐसे बातें कर पाती हूँ? या मैं जल्दी में होती हूँ, तनाव में होती हूँ?