आज सुबह चाय की चुस्की के साथ एक पुरानी किताब खोली जो महीनों से रैक में पड़ी थी। पहला वाक्य पढ़ते ही मन में एक सवाल उठा - "क्या मैं वही इंसान हूँ जो छह महीने पहले था?" किताब वही थी, शब्द वही थे, लेकिन उनका अर्थ अलग लग रहा था। जैसे किसी परिचित रास्ते पर चलते हुए अचानक एक नया मोड़ दिखाई दे।
दोपहर में बाजार जाते वक्त एक छोटी सी गलती हुई। मैं अपने विचारों में इतना खोया था कि गलत बस में चढ़ गया। दस मिनट बाद जब अहसास हुआ तो पहले झुंझलाहट हुई, फिर मुस्कान आ गई। क्या इसी को 'ध्यान में रहना' कहते हैं - जब शरीर एक जगह हो और मन कहीं और? उतरकर वापस आने का रास्ता ढूँढते हुए सोचा कि ये भटकना भी एक तरह की यात्रा है।
शाम को एक पुराने दोस्त का फोन आया। बातचीत में उसने कहा, "तुम्हें तो हमेशा सब कुछ समझ आ जाता है।" मैं हँसा। अगर उसे पता होता कि आधे समय मैं खुद अपने विचारों को समझने में उलझा रहता हूँ। हमने बीस मिनट बात की - उसके काम की चिंताएँ, परिवार के दबाव, और उस छोटी खुशी की जो उसे सुबह की धूप में मिली। फोन रखने के बाद महसूस हुआ कि सुनना भी एक किस्म का ध्यान है।
रात में डायरी के पन्ने पलटते हुए पिछले महीने की एक एंट्री मिली जहाँ मैंने लिखा था - "मन को शांत करना है।" आज उसी लाइन को पढ़कर लगा कि शायद मन को शांत करने से ज्यादा जरूरी है उसके शोर को समझना। जैसे किसी भीड़ वाली जगह में शोर को रोकने की जगह हम उसके बीच अपनी आवाज़ पहचानना सीखें।
एक छोटा प्रयोग: कल रात सोने से पहले पाँच मिनट के लिए कागज़ पर सिर्फ एक सवाल लिखिए - "आज मैंने किस बात पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया?" जवाब न दें, सिर्फ सवाल लिखें। फिर देखिए अगले दिन वो सवाल आपको कैसे याद आता है।
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