आज सुबह चाय बनाते समय एक छोटी सी बात पर ध्यान गया। जब पानी उबल रहा था, तो उसकी आवाज़ धीरे-धीरे बदल रही थी—पहले हल्की सी सरसराहट, फिर तेज़ बुलबुले। मैंने सोचा, क्या हमारे विचार भी ऐसे ही नहीं? शुरुआत में धीमे, फिर धीरे-धीरे तेज़ होते जाते हैं, और अगर हम ध्यान न दें तो उबल कर बाहर आ जाते हैं।
कल शाम एक दोस्त से बातचीत हुई। वो परेशान थी क्योंकि उसने किसी से कुछ कहा था जो शायद उसे नहीं कहना चाहिए था। मैंने पूछा, "क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारे शब्द सच्चे थे?" उसने कहा, "हाँ, लेकिन शायद सही समय नहीं था।" मुझे लगा यह बहुत गहरी बात है—सच्चाई और समय का सही मेल। हम अक्सर यह मान लेते हैं कि अगर कुछ सच है तो उसे कहना सही है, लेकिन क्या सच्चाई का भी एक सही समय होता है?
दोपहर में एक छोटी सी गलती हुई। मैं एक पुरानी किताब पढ़ रही थी और एक पन्ने पर पेंसिल से निशान लगा दिया, सोचकर कि बाद में वापस आऊँगी। लेकिन जब वापस आई तो भूल गई थी कि मैंने क्यों निशान लगाया था। यह छोटी सी बात मुझे सिखा गई कि जब कुछ महत्वपूर्ण लगे, तो बस निशान नहीं, बल्कि दो-तीन शब्द लिख देना चाहिए। हमारा भविष्य का मन, वर्तमान के मन से बहुत अलग हो सकता है।
शाम को खिड़की के पास बैठी थी और बाहर की रोशनी देख रही थी—सूरज ढल रहा था और आसमान में नारंगी और गुलाबी रंग फैल रहे थे। मैंने महसूस किया कि यह रंग हर दिन अलग होते हैं, लेकिन हम अक्सर देखते नहीं। हम मान लेते हैं कि सूरज हमेशा एक जैसा ढलता है। लेकिन क्या हम भी ऐसे ही नहीं—हर दिन थोड़े अलग, लेकिन हम खुद को एक जैसा मान लेते हैं?
एक सवाल जो मन में आया: अगर आप आज सिर्फ पाँच मिनट के लिए खुद से यह पूछें कि "मैं इस पल में क्या महसूस कर रहा हूँ, और क्यों?"—तो क्या जवाब मिलेगा? कोई बड़ा जवाब नहीं चाहिए, बस एक छोटी सी पंक्ति। शायद यह छोटा सा प्रयोग हमें खुद को थोड़ा बेहतर समझने में मदद करे।
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