आज सुबह की धूप खिड़की से आई तो मैंने देखा कि धूल के कण हवा में तैर रहे थे। एक पल के लिए सोचा - ये कण कहाँ से आए होंगे? शायद किसी पुरानी किताब से, या फिर बाहर की सड़क से। फिर ख्याल आया कि हम भी तो ऐसे ही हैं - छोटे-छोटे पलों से बने, जो कहीं से आते हैं और कहीं चले जाते हैं।
दोपहर में चाय बनाते समय एक छोटी सी गलती हुई। पानी उबालते समय ध्यान कहीं और था और चाय की पत्ती ज्यादा डाल दी। पहले सोचा कि बर्बाद हो गई, लेकिन फिर एक घूँट लिया। कड़वी थी, हाँ, लेकिन उस कड़वाहट में भी एक गहराई थी जो रोज़ की चाय में नहीं होती। मन में आया - क्या जीवन में भी ऐसा नहीं होता? जो गलती लगती है, वही कभी-कभी कुछ नया सिखा देती है।
शाम को बालकनी में खड़ी थी तो पड़ोस से किसी का गाना सुनाई दिया। एक बुजुर्ग आवाज़, शायद किसी पुराने गीत की धुन। शब्द साफ नहीं सुनाई दिए, लेकिर उस आवाज़ में एक अजीब सी शांति थी। सोचा - संगीत में कितनी ताकत होती है कि बिना किसी को देखे, बिना कुछ कहे, दिल तक पहुँच जाता है।
रात को एक सवाल मन में आया। जब हम किसी बात को सोचते हैं, तो क्या वह विचार हमारा है या फिर हमने उसे कहीं से उठाया है? जैसे आज धूल के कणों वाली बात - ये ख्याल मेरा था या किसी किताब में पढ़ा था? और अगर किसी ने पहले सोचा हो, तो क्या वह कम मेरा हो जाता है?
तुम भी आज पाँच मिनट निकालो। बस एक चीज़ देखो - रोशनी, आवाज़, गंध, कुछ भी। फिर सोचो - यह मुझे क्या याद दिलाती है? सिर्फ एक लाइन लिखो। कोई बड़ी बात नहीं, बस एक छोटा सा अहसास।
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