आज सुबह खिड़की के पास बैठे हुए मैंने देखा कि कैसे हवा में धूल के कण धीरे-धीरे नीचे गिर रहे थे। सूरज की किरणें उन्हें रोशन कर रही थीं, और वे एक तरह से नाच रहे थे—बिना किसी जल्दी के, बिना किसी मंजिल के। मुझे लगा कि मेरे विचार भी ऐसे ही होते हैं। कभी-कभी हम उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे बस आते हैं और चले जाते हैं, जैसे वो धूल के कण।
कल रात मैंने एक पुरानी डायरी पढ़ी, जिसमें मैंने लिखा था कि मुझे लगता है कि मैं हमेशा सही हूँ। आज वह लाइन पढ़कर मुझे हँसी आ गई। कितनी बार मैंने ऐसा सोचा, और कितनी बार मैं गलत निकली। पर शायद यही सीखने का तरीका है—खुद को गलत मानने की हिम्मत रखना। मैंने सोचा कि अगली बार जब मैं किसी बहस में पड़ूं, तो पहले खुद से पूछूंगी, "क्या मैं सुनने के लिए तैयार हूँ?"
दोपहर में बाजार गई थी। एक बुजुर्ग महिला फलों की दुकान पर खड़ी थी। उसने दुकानदार से कहा, "भैया, ये आम बहुत महंगे हैं।" दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा, "माताजी, ये मीठे भी बहुत हैं।" वो महिला रुकी, फिर बोली, "ठीक है, दो किलो दे दो।" उस छोटी सी बातचीत में कितनी मुलायमत थी। न गुस्सा, न जिद—सिर्फ एक सहज बातचीत। मुझे लगा, क्या मैं भी ऐसे बातें कर पाती हूँ? या मैं जल्दी में होती हूँ, तनाव में होती हूँ?
शाम को मैंने एक प्रयोग किया। मैंने पाँच मिनट के लिए बस बैठकर सांस लेने पर ध्यान दिया। कोई मंत्र नहीं, कोई ऐप नहीं—बस सांस अंदर, सांस बाहर। पहले दो मिनट में मन बहुत भागा। "मुझे वो काम करना है," "कल क्या होगा," "मैंने वो क्यों कहा।" लेकिन तीसरे मिनट के बाद, थोड़ी शांति आई। जैसे किसी ने मन की आवाज़ को धीमा कर दिया हो। मुझे नहीं पता कि यह हर दिन काम करेगा या नहीं, पर आज इसने मदद की।
मैं सोच रही थी कि फ़लसफ़ा किताबों में नहीं, रोज़मर्रा के छोटे-छोटे पलों में छिपा होता है। एक सवाल आपके लिए: क्या आप आज पाँच मिनट के लिए खुद को बिना किसी काम के बैठने की इजाज़त दे सकते हैं? बस सांस लेना, और देखना कि मन क्या कहता है। शायद यह छोटा सा प्रयोग कुछ नया सिखा दे।
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