आज सुबह स्टाफ रूम में नताशा मैम बोल रही थीं — पाँच बजे उठकर एक घंटा वर्कआउट, तब कहीं जाकर दिन की शुरुआत ठीक लगती है उन्हें। बात उनसे थी, मेरे बारे में नहीं। फिर भी कंधों में एक जकड़न आ गई — वह जकड़न जो तुलना से आती है, थकान से नहीं। मैंने तीनों को अलग रखने की कोशिश की: शरीर बोला (कंधे), विचार आया (तू ऐसा क्यों नहीं कर पाती?), और भावना थी एक पुरानी धारणा का वज़न — कि सुबह उत्पादक न हो, तो दिन जैसे हुआ ही नहीं।
वह धारणा मैंने खुद नहीं चुनी थी, पर वह मेरे कंधों को पहचानती है। अभी उसे बदलने का कोई इरादा नहीं — बस यह देखना है कि वह कहाँ-कहाँ दिखती है।
इस हफ्ते का प्रयोग — रात ग्यारह बजे से पहले स्क्रीन बंद, कमरे की बत्ती धीमी, सुबह की पहली चाय बिना फ़ोन के। चार दिन पूरे हो गए।