आज दोपहर रोहन की माँ से मुलाकात हुई — कक्षा सातवीं। बातों के बीच उन्होंने कहा, "मैम, आप बताइए, हम क्या करें।" उस एक वाक्य पर कंधे थोड़े झुके — वो भारीपन जो किसी की उम्मीद उठाने से आता है, थकान से नहीं। विचार यह था: मेरे पास ठीक-ठीक जवाब नहीं है। और भावना — एक हल्की बेचैनी, जैसे खाली हाथ से किसी को विदा करना हो। तीनों अलग-अलग थे, पर उस कमरे में सब घुले हुए लगे।
घर लौटकर बालकनी पर बैठी। चाय ठंडी थी, पी ली। इस हफ्ते एक छोटा प्रयोग चल रहा है:
परिकल्पना: रात दस के बाद फ़ोन बंद करने से सुबह आँखों के पीछे की थकान कम होगी।