आज सुबह चाय बनाते समय एक अजीब बात नोटिस की। पानी उबलने की आवाज़ सुनकर मैं वहीं खड़ी रह गई, बस सुनती रही। कुछ सोच नहीं रही थी, कुछ कर नहीं रही थी - सिर्फ उस बुदबुदाहट को महसूस कर रही थी। कितनी बार चाय बनाई होगी, पर शायद पहली बार सच में सुना।
फिर मन में एक सवाल उठा - क्या हम अपने रोज़मर्रा के कामों में इतने खो जाते हैं कि असल अनुभव ही भूल जाते हैं? मैं अक्सर सोचती हूँ कि अगली चीज़ के बारे में - अगला काम, अगली मीटिंग, अगला मैसेज। यह पल तो बस एक सीढ़ी बन जाता है अगले पल तक पहुँचने के लिए।
दोपहर में एक छोटा सा द्वंद्व आया। एक दोस्त ने फोन किया, पर मैं बीच किताब में थी। पहला विचार था - "बाद में बात करूँगी"। फिर रुकी। क्यों? क्या यह किताब इतनी ज़रूरी है कि एक इंसान से जुड़ाव टाल दूँ? मैंने फोन उठाया। बातचीत सिर्फ पाँच मिनट की थी, पर उसमें एक हल्कापन था - जैसे किसी ने खिड़की खोल दी हो बंद कमरे में।
शाम को यह सोच आई - हम प्राथमिकताएँ कैसे तय करते हैं? कौन सी चीज़ें "ज़रूरी" हैं और कौन सी सिर्फ "अभी जो कर रहे हैं"? मुझे लगता है कि हम अक्सर उलझन में रहते हैं इन दोनों के बीच।
तो एक छोटा सा प्रयोग - अगर आप भी चाहें तो कल सुबह कोई एक रोज़ का काम करते समय रुकिए। बस दस सेकंड के लिए। नल से पानी गिरते हुए देखिए। कॉफी की खुशबू को सूँघिए। दरवाज़ा बंद करने की आवाज़ सुनिए। सिर्फ महसूस करिए - बिना सोचे कि यह "समय की बर्बादी" है।
शायद हम पाएंगे कि हम जहाँ हैं, वहीं होना भी एक अनुभव है। एक क़ीमती अनुभव।
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