आज सुबह पड़ोसी की बेटी की आवाज़ कान में पड़ी — वो अपनी माँ से कह रही थी, "तुम हमेशा मेरी बात काटती...
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आज सुबह पड़ोसी की बेटी की आवाज़ कान में पड़ी — वो अपनी माँ से कह रही थी, "तुम हमेशा मेरी बात काटती...
आज दोपहर स्टाफ रूम में एक वाक्य कानों में पड़ा — "वो बच्चा बस attention चाहता है।" इतनी सफाई से कहा...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज सुबह की चाय का स्वाद कुछ अलग था। शायद पानी ज़्यादा उबला था, या फिर मैंने पत्ती थोड़ी देर ज़्यादा रख दी। पर जब मैंने कप को दोनों हाथों में पकड़ा, उसकी गर्माहट ने मुझे याद दिलाया कि हर दिन एक नया प्रयोग है। कुछ भी बिल्कुल वैसा नहीं होता जैसा कल था।
खिड़की के पास बैठकर मैंने देखा कि एक चिड़िया बार-बार एक ही डाल पर आ रही थी। पहले मुझे लगा वो कुछ ढूंढ रही है, फिर समझ आया कि शायद वो सिर्फ़ वहाँ बैठना पसंद करती है। उस छोटी सी बात ने मुझे सोचने पर मजबूर किया—हम इंसान भी तो बार-बार अपने पुराने विचारों की उन्हीं डालियों पर लौट जाते हैं। क्या यह आदत है, या सुरक्षा की तलाश?
कल रात एक पुराना दोस्त फ़ोन पर बोल रहा था, "मैं समझ नहीं पा रहा कि मुझे क्या चाहिए।" मैंने बस सुना, कुछ जवाब देने की कोशिश नहीं की। बातचीत ख़त्म होने के बाद मुझे एहसास हुआ कि शायद उसे जवाब नहीं, बल्कि सिर्फ़ सुने जाने की ज़रूरत थी। कभी-कभी ख़ामोशी सबसे अच्छी सहानुभूति होती है।
दोपहर में मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। मैंने अपनी डायरी में सिर्फ़ तीन शब्द लिखे: "आज मैं शांत।" फिर मैंने ख़ुद से पूछा—क्या यह सच है? क्या मैं वाक़ई शांत हूँ, या बस ऐसा दिखने की कोशिश कर रहा हूँ? इस एक सवाल ने मुझे दिखाया कि कभी-कभी हम अपने आप को वो बनाने की कोशिश करते हैं जो हम सोचते हैं कि हमें होना चाहिए, न कि वो जो हम हैं।
शाम को जब सूरज ढल रहा था, मैंने महसूस किया कि दिन बीत गया, पर कोई बड़ी बात नहीं हुई। और शायद यही ख़ूबसूरती है—हर दिन को कोई बड़ा मतलब ढूँढने की ज़रूरत नहीं। छोटी-छोटी बातों में, चाय की गर्माहट में, चिड़िया की आदत में, दोस्त की ख़ामोशी में, ज़िंदगी अपना रास्ता बना लेती है।
अगर आप चाहें, तो कल सुबह सिर्फ़ पाँच मिनट के लिए किसी एक चीज़ को ग़ौर से देखें—एक पत्ता, एक कप, आसमान का एक कोना। बस देखें, बिना कुछ सोचे। और फिर ध्यान दें कि आपके मन में क्या उठता है।
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