आज सुबह खिड़की खोलते समय मुझे हवा में गुलमोहर की हल्की खुशबू आई। अजीब बात है कि मैं पिछले तीन दिनों से उसी रास्ते से गुजर रही थी, लेकिन आज पहली बार उस सुगंध पर ध्यान गया। शायद मन जब शांत होता है, तभी हम वास्तव में चीजों को देख पाते हैं - या सूंघ पाते हैं।
दोपहर में एक पुरानी डायरी पलटते हुए मुझे अपनी एक पुरानी गलती याद आई। पिछले साल मैंने किसी बहस में जीतने की कोशिश में अपनी बहन की बात बीच में ही काट दी थी। आज उसे पढ़कर समझ आया कि सुनना केवल चुप रहना नहीं है - यह दूसरे की बात को अपने भीतर जगह देना है। जीतना और समझना, दोनों अलग-अलग चीजें हैं।
शाम को चाय बनाते समय मैंने एक छोटा-सा प्रयोग किया। पहले मैं पानी उबालते समय फोन देखती रहती थी। आज मैंने सिर्फ पानी में उभरते बुलबुलों को देखा - पहले छोटे-छोटे, फिर बड़े होते हुए। कितनी सामान्य चीज है, पर जब आप पूरी तरह मौजूद हों, तो वह भी एक ध्यान बन जाती है।
मन एक अजीब यात्री है - कभी अतीत में, कभी भविष्य में, लेकिन शायद ही कभी 'अभी' में। आज का मेरा छोटा सा अनुभव यही था - जब मैं वास्तव में उपस्थित थी, तब गुलमोहर की खुशबू थी, तब बुलबुलों की सुंदरता थी।
अगर आप चाहें तो आज रात सोने से पहले पाँच मिनट के लिए यह कोशिश करें: अपनी सांसों को गिनें, सिर्फ दस सांसें। देखें कितनी बार आपका मन भटकता है। कोई निर्णय नहीं, कोई आलोचना नहीं - बस देखना। शायद यह छोटी-सी जागरूकता कल की सुबह को थोड़ा अलग बना दे।
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