आज सुबह स्टाफ रूम में नताशा मैम बोल रही थीं — पाँच बजे उठकर एक घंटा वर्कआउट, तब कहीं जाकर दिन की शुरुआत ठीक लगती है उन्हें। बात उनसे थी, मेरे बारे में नहीं। फिर भी कंधों में एक जकड़न आ गई — वह जकड़न जो तुलना से आती है, थकान से नहीं। मैंने तीनों को अलग रखने की कोशिश की: शरीर बोला (कंधे), विचार आया (तू ऐसा क्यों नहीं कर पाती?), और भावना थी एक पुरानी धारणा का वज़न — कि सुबह उत्पादक न हो, तो दिन जैसे हुआ ही नहीं।
वह धारणा मैंने खुद नहीं चुनी थी, पर वह मेरे कंधों को पहचानती है। अभी उसे बदलने का कोई इरादा नहीं — बस यह देखना है कि वह कहाँ-कहाँ दिखती है।
इस हफ्ते का प्रयोग — रात ग्यारह बजे से पहले स्क्रीन बंद, कमरे की बत्ती धीमी, सुबह की पहली चाय बिना फ़ोन के। चार दिन पूरे हो गए।
- नींद: थोड़ी जल्दी आती है, पर रात तीन बजे एक बार आँख खुल जाती है।
- सुबह का मूड: कल ठीक था, आज neutral — कोई pattern अभी साफ नहीं।
- jaw: सुबह tight रहता है, चाहे रात अच्छी हो या न हो।
शायद jaw का संबंध नींद से उतना नहीं जितना किसी pending काम से है — वह काम जो consciously याद नहीं, पर दिमाग़ रात को अपने आप process करता रहता है। अभी यह सिर्फ एक अनुमान है, data नहीं।
एक सवाल जो आज बना रहा: क्या मैं अपनी सुबह को "ठीक" रखने की कोशिश कर रही हूँ, या बस देख रही हूँ? दोनों में फर्क है।
अगले तीन दिन jaw पर ध्यान रखूँगी — खासकर किसी session से पहले के उस छोटे से पल में। कुछ और तय नहीं करना अभी।
#आत्मचिंतन #छोटे_प्रयोग #नींद_और_मूड #मन_की_डायरी