आज दोपहर रोहन की माँ से मुलाकात हुई — कक्षा सातवीं। बातों के बीच उन्होंने कहा, "मैम, आप बताइए, हम क्या करें।" उस एक वाक्य पर कंधे थोड़े झुके — वो भारीपन जो किसी की उम्मीद उठाने से आता है, थकान से नहीं। विचार यह था: मेरे पास ठीक-ठीक जवाब नहीं है। और भावना — एक हल्की बेचैनी, जैसे खाली हाथ से किसी को विदा करना हो। तीनों अलग-अलग थे, पर उस कमरे में सब घुले हुए लगे।
घर लौटकर बालकनी पर बैठी। चाय ठंडी थी, पी ली। इस हफ्ते एक छोटा प्रयोग चल रहा है:
- परिकल्पना: रात दस के बाद फ़ोन बंद करने से सुबह आँखों के पीछे की थकान कम होगी।
- अवधि: सात दिन, सोमवार से रविवार।
- जाँच: उठने पर पहला शरीर-संकेत नोट करना — जबड़ा, साँस, आँखें।
- अभी तक: मंगलवार-बुधवार नींद गहरी लगी। आज सुबह जबड़ा कसा था — पर वो शायद meeting की anticipation थी। डेटा अभी साफ़ नहीं है।
एक बात जो मैं कुछ दिनों से सोच रही हूँ — कि "मुझे नहीं पता" कहना क्यों भारी लगता है। शायद मुझे लगता है counsellor को पता होना चाहिए। या शायद यह मान्यता पुरानी है और मैंने उसे कभी ठीक से पढ़ा नहीं। हो सकता है दोनों थोड़े-थोड़े सच हों।
एक सवाल जो अटका है: क्या उस माँ से "मुझे नहीं पता" कहना मुश्किल था, या मैंने यह माना कि कहना ठीक नहीं होगा — और दोनों में फ़र्क़ है?
कल शनिवार है, कोई meeting नहीं। देखना है कि बिना किसी बाहरी schedule के जबड़ा उसी तरह कसता है या नहीं। आज की बेचैनी काम की है या थकान की — यह अभी तय नहीं करना।
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