आज दोपहर स्टाफ रूम में अनिता मैडम कह रही थीं — किसी बच्चे के बारे में, जो रोज़ कक्षा में कुछ न कुछ कर देता है — "यह तो बस ध्यान खींचने के लिए करता है।" एक छोटा-सा वाक्य था, बातचीत के बीच में। मैंने कुछ नहीं कहा। चाय का कप रखा और खिड़की की तरफ देखने लगी।
कंधे थोड़े खिंच गए थे। जबड़ा भारी हुआ — यह शरीर पहले बोलता है। उसके बाद सोच आई: "यह diagnosis नहीं है, यह उनकी थकान है।" और जो महसूस हुआ वह शायद नाराज़गी नहीं थी — एक धीमी-सी उदासी थी, जैसे कुछ छूट गया हो। तीनों को अलग-अलग रखने पर साफ़ दिखता है कि किस से निपटना है।
पिछले छह दिनों से एक प्रयोग चल रहा है:
- hypothesis: रात दस बजे के बाद स्क्रीन बंद करने से सुबह का मूड बेहतर रहेगा
- अवधि: इस हफ्ते, रविवार तक
- check: रोज़ सुबह उठते वक्त एक लाइन — कंधे कैसे हैं, आँखें कैसी हैं
- अब तक का data: चार दिन नींद ठीक रही; दो दिन नहीं — उन दोनों रातों में चाय भी देर से पी थी
अभी confounding variables ज़्यादा हैं। नतीजा निकालना जल्दबाज़ी होगी। हो सकता है स्क्रीन का असर हो, हो सकता है कैफीन का — या दोनों मिलकर काम करते हों। अभी सिर्फ देखना है।
एक सवाल जो आज पहले नहीं आया था: क्या मैं चुप रही क्योंकि मैं असहमत थी, या इसलिए कि असहमति ज़ाहिर करने की ऊर्जा नहीं थी? दोनों का मतलब अलग-अलग होगा। अभी तय नहीं करती।
कल सुबह देखूँगी — कंधे कैसे हैं, और अगर अनिता मैडम से फिर बात हो तो शरीर में क्या होता है।
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