आज सुबह पड़ोसी की बेटी की आवाज़ कान में पड़ी — वो अपनी माँ से कह रही थी, "तुम हमेशा मेरी बात काटती...
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आज सुबह पड़ोसी की बेटी की आवाज़ कान में पड़ी — वो अपनी माँ से कह रही थी, "तुम हमेशा मेरी बात काटती...
आज दोपहर स्टाफ रूम में एक वाक्य कानों में पड़ा — "वो बच्चा बस attention चाहता है।" इतनी सफाई से कहा...
आज दोपहर की पैरेंट मीटिंग में सुनीता ताई ने कहा — "मैडम, बच्चा पढ़ता तो है, पर कभी-कभी बहुत अकेला...
आज सुबह जब माँ का फ़ोन आया — बस हाल-चाल पूछने वाला, दस मिनट का — तो मेरे कंधे पहले ही थोड़े चढ़ गए...
आज दोपहर को स्टाफ रूम में मिसेज़ देशपांडे ने किसी से कहा — "बच्चों को बस थोड़ी ज़्यादा मेहनत चाहिए,...
आज सुबह खिड़की से आती धूप में एक अजीब सी शांति थी। उसकी किरणें दीवार पर धीरे-धीरे खिसक रही थीं, जैसे समय का कोई मूक संदेश हो। मैं चाय बनाते हुए यह देख रही थी और सोच रही थी कि हम कितनी बार इन छोटी-छोटी चीज़ों को अनदेखा कर देते हैं।
कल रात मैंने एक पुरानी डायरी पढ़ी थी। उसमें मैंने लिखा था, "मैं हमेशा सही होना चाहती हूँ।" आज यह पंक्ति पढ़कर हँसी आ गई। सही होने की चाह ने मुझे कितनी बार दूसरों की बात सुनने से रोका है। यह एक छोटी सी गलती नहीं, बल्कि एक आदत थी जो मैंने बरसों तक पाली। अब समझ आता है कि सुनना भी एक तरह का ज्ञान है - शायद बोलने से भी गहरा।
दोपहर में एक पड़ोसी बुजुर्ग से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा, "बेटा, मन को समझने के लिए उसे थोड़ा खाली भी रखना पड़ता है।" सरल शब्द थे, पर मर्म गहरा। हम अपने मन को विचारों, योजनाओं, चिंताओं से इतना भर लेते हैं कि उसमें नए अनुभवों के लिए जगह ही नहीं बचती।
शाम को मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। पाँच मिनट के लिए बस बैठी रही - न फोन, न किताब, न कोई काम। सिर्फ साँस और आसपास की आवाज़ें। पहले मिनट में बेचैनी हुई, दूसरे में कुछ करने की इच्छा, लेकिन तीसरे मिनट के बाद एक अलग सी स्थिरता आई। यह प्रयोग मैं आपको भी सुझाऊँगी - कल सुबह सिर्फ पाँच मिनट, बिना किसी काम के बैठिए। देखिए मन क्या कहता है।
मन एक नदी की तरह है - कभी तेज़, कभी धीमा, कभी स्वच्छ, कभी गंदला। पर हम किनारे पर खड़े होकर उसे देख सकते हैं, उसमें बह जाने की ज़रूरत नहीं।
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